कोख में पल रही है वह मैं डरता हूं न लाऊं उसे क्या है यहां ऐसा मैं दे पाऊंगा जो उसे आ ही गई है अब बहुत-बहुत घबराता हूं बता भी नहीं सकता बताऊं भी किसे मेरी ही बेटी है बस वह और दुनिया के लिए महज चारा अखबार भी पढ़ेगी वह और देखेगी जहान की हकीकत सवाल भी करेगी वह और समझेगी भी नजरों में उतर आई हवस को डरता हूं मैं तब कैसे छूपा पाऊंगा मेरी ही 'नपुंसक" कौम को उससे और उन तमाम बेटियों से जिन्हे चाहिए भी तो महज आधी आबादी का 'सम्मान"
पनाह में छुपा ले मुझे कि रास अब आती नहीं ये दुनिया सदी के मानिंद गुजरता है हर एक पल हर शख्स लगता है अजनबी और चुभती है शूल की तरह जिंदगी मैं अटका हूं कहीं कि कब आएगा वो कल जब काली बदली बन बरसेगी तू घनघोर जब शरद की चांदनी बन कर देगी शीतल मेरा हर पोर जब सहरा के इस प्यासे को नख-शिख तक कर देगी तर कब...कब...कब... बता ए-पत्थरदिल जब तू पिघल कर बहने लगेगी उस दरिया की तरह जो पनाह देगा मुझे और मैं डूब जाऊंगा अनंत-अनंत गहराई में कहीं
काश, ये निराशा मेरा सर्वत्र निगल जाए ना कोई उम्मीद फिर कभी अपना फन फैलाए डूब जाऊं अंधेरे में इस तरह ना फिर कभी 'स्व" नजर भी आए बस मैं रहूं, मुझमें ही सिमटा ना कोई फिर दस्तक भी दे पाए सब कुछ यहीं थम जाए यहीं, हां बस यहीं रूक जाए ना कोई साथ चलने की फिर कभी आशा जगाए किश्तों की बजाय, काश मौत अभी ही आ जाए
हर वक्त एक द्वंद चलता रहता है। शायद यह सबमें चलता होगा। कोई एक मैं ही नया नहीं हूं... हो सकता है सबको नजर भी आता हो... अपने मन में बहुत कुछ हर वक्त घटता सा। कई बार बड़ी-बड़ी घटनाएं सुनामी समान अंदर ही अंदर उठती है... बाहर एक दम सब शांत... किसी को कोई आभास नहीं... पर अंदर का आभास मुझे ही है... सब तबाह... सब... फिर नया होगा तबाही के बाद... एक उम्मीद... एक लाचारी... हार... संघर्ष... और वही रोशनी की ओर प्यासी सी दौड़। क्या बस इतनी-सी है ये जिंदगी। प्यास इतनी बड़ी होती है... कि हर बार भी हारकर मैं उठ खड़ा होता हूं। शायद इस डर से भी कि कहीं यहीं प्यासा ना मर जाऊं... या फिर यही नियति है, जिसे मुझे चुनना ही है... कोई च्वाइस नहीं। च्वाइस तो होती ही कहां है, जिसके पास होती होगी... क्या उनके पास जिंदगी की चाह होती होगी? शक है मुझे, क्योंकि प्यास ही तो जिंदगी है... वह रोशनी ही तो है, जिसकी चाह में मैं अंधेरी टनल में यहां-वहां टकराते हुए भी घायल, परेशान, हताश होकर भटक रहा हूं। मुझे मालूम है, इस जन्नात की हकीकत... रोशनी कभी किसी का इंतजार नहीं करती। वह मरीचिका है... जब जहां उजियारा, उस वक्त के लिए, बस उसी वक्त तक के लिए वह उसकी है... वरना तो बस भागना ही ही है अपनी प्यास के साथ... अंधों समान रोशनी की चाह...। बाहर की सुनामी बरसों बरस में एक बार आया करती है, पर मेरी सुनामी की फ्रिक्वेंसी इतनी है कि अब तबाही में ही रहने की आदत हो गई है। नहीं चाहता कुछ भी व्यवस्थित करना... बस दौड़ते रहने की चाह है... बिना सोचे, जाने, समझे... कई बार तो उजियारे की चाह में जुगनूओं को भी एक-एक कर बिन लेता हूं... शायद कभी रोशन हो मेरा स्व... शायद सुनामी थमे... शायद जिंदगी की रेस में जिंदगी से मुलाकात हो... शायद रोशनी किसी दिन मेरा कंठ तक तर कर दे... शायद...
न छू इसे, रहने दे ऐसा ही जख्म गहरा है कितना देखूं तो एक नजर भर परख लूं यह भी दर्द कब खुद बन जाया करता है दवा और इसलिए भी मत छू विष बीज है यह कमबख्त करता है छूते ही सीधे दिल पर असर न दवा आती है काम न करती है दुआ असर चाहकर भी कहां मर पाएगी तू खुद जहर बनकर भी जिंदा रह जाएगी तू
काश कभी ऐसा हो मौन ही शब्द बन जाए तब तेरा दिल सीधे जान लेगा इस दिल के हाल दोनों कर लेंगे मिलबैठ दूर सब शिकवे-शिकायत बता भी देंगे जख्म किस कदर गहरें हैं कमबख्त और इकदूजे को लगा देंगे राहत का मलहम दिन-दिन भर करते रहेंगे दिल्लगी की बातें न समय, न शब्द बस बोलेगा सिर्फ मौन
चुपके से सिरहाने रख आया हूं कई ख्वाब सुनहरे से कोई एक दिन तो मेरा होगा जब ये तैरकर जा बसेंगे तेरी आंखों में उसके बाद यकिनन हर पल मेरा होगा फिर, सपनों से दूर कहीं बुन रहे होंगे हम एक हकिकत की दुनिया अपनी-सी जो कुछ-कुछ होगी मिठी-सी थोड़ी होगी सोंधी-सी
युगंधरा... दुनिया की सबसे खुबसूरत लड़की... सबसे प्यारी बेटी... कितनी भोली, मासूम और वाकई लाजवाब। क्या सुखद अहसास है... तेरे साथ का। मेरा दिन में सैकड़ों बार तुझे आय लव यू बेबी कहना और हर बार तेरा बड़ा प्यारा सा जवाब- आय लव यू दाता... वाह! और जिंदगी वहीं थम जाती है, इससे ज्यादा क्या कोई खुशनसीब हो सकता है... भला। तुझ पर इन दिनों 'छोटा भीम" का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। खुद को छोटा भीम कहती है और अपनी दादी को नाम दिया है छुटकी... सारा दिन छुटकी को लिए-लिए घुमना, कितना मजेदार है। छुटकी भी बड़े मजे से डांट खाती, मस्ती करती, बॉक्सिंग करती नजर आती है। एक दिन छोटा भीम और छुटकी अन्नापूर्णा मंदिर जाते हैं। दोनों भगवान को धोक देते हैं। छोटा भीम के मुंह से निकलता है- सबका ध्यान रखना...। यह सुन छुटकी और पास ही खड़े लोग भी चौंक जाते हैं। ऐसा है मेरा छोटा भीम। युगी और दादी जब मंदिर से निकलकर घर को लौट रहे होते हैं, तो युगी कहती है- दादी सा. आप मुझे नीचे उतार दो, आप थक जाओगे। दादी बेचारी वैसे ही इमोशनल... वो पानी भरी आंखों से पूछती है- चलने से तो दोनों थक जाएंगे। युगी थोड़ा चलने के बाद कहती है- दादीसा. ऑटो... और फिर दोनों मजे से ऑटो में बैठ घर पहुंचते हैं। मम्मा मुझे अपने छोटा भीम का मंदिर में धोक के दौरान का सारा किस्सा सुनाती है। तो मैंने युगी से पूछा- किसने कहा तुझे कि भगवान से ध्यान रखने को बोलने का। तो बोलती है नानी ने। ...कितनी बखूबी उसने नानी की सीख को उतार लिया है। आश्चर्य तब हुआ जब मैंने उससे पूछा कि ध्यान रखना, पर किसका? तो वह एक सांस में मम्मा, दाता, छुटकी, नानी, नाना, दादा, लखन, पुष्कर, अम्मा, काकाओं सहित बीसियों नाम... कमाल है... महज ढाई साल की लड़की और भगवान से ज्यादा ध्यान तो यह रख रही है, अपने फेवरेट लोगों का। उसके प्यार करने का तरीका भी कमाल है... शायद ही कोई हो जो मुझे इस हद तक प्यार करता हो! मैं ऑफिस में होता हूं और रात में उसके सोने का वक्त होता है तो उसे मेरी चादर, तकिया और जगह चाहिए होती है। फिर मजाल की सोना वहां सो जाए। सोने का तरीका भी देखो... चादर ओढ़कर, मेरे तकिये के नीचे एक हाथ दबाकर, दूसरा हाथ अपने बालों को सहलाते हुए कहती है- अब सो जाते हैं। रात की तीन बजे जब मैं घर पहुंचता हूं, तो मैं उसके नींद में होने के बावजूद आय लव यू कहता हूं, तो कई बार वह नींद में ही बड़बड़ाती है आय लव यू दाता...। अभी 3-4 दिन पहले मुझे बुखार आया। युगी को इंफेक्शन न हो जाए, इसलिए मैं अलग कमरे में सोया। युगी रोज रात को उठती, मां से पूछती दाता आए? सोना बोलती- हां, तो सवाल होता- बीमार है, दूसरे कमरे में सो गए? मुझे वह कई बार बाळा (बच्चा) कहती है और खुद को मेरी मां मानती है। उस दौरान जो लाड़ मुझे मिलता है, वो अद्भुत है। खुद की छोटी सी गोद में मेरा बड़ा सा सिर जैसे-तैसे रखती है। छोटे-छोटे गद्देदार हाथों से थपकियां देती, किस करती वह मेरी जान ही ले लेती है।... आय लव यू बेबी...
चेहरे के पीछे छिपे होते हैं कईं चेहरे दुआ करता हूं देख न पाऊं इन्हें कभी क्या पता कब कोई दगाबाज निकल आए डरता नहीं हूं, लेकिन भ्रम में जिंदगी हो जाए बसर तो क्या बुरा है
गरीबी और भूख के कारण ही तो मेरे माँ-बाप ने बड़े भरोसे से मुझे अपने चाचा-चाची के पास भेजा था। गाँव में कई बार इंदौर का नाम सुना था... आना तो नहीं चाहती थी अपनों को छोड़कर... पर ये भी तो अपने (?) ही कहलाते थे... क्या किया इन्होंने... और इस इंदौर ने भी तो नपुंसकों की तरह देखा भर ना! जबसे इस शहर में आई कोई दिन ऐसा नहीं गुजरा... जब तिल-तिल नहीं मरी... रहम की भीख नहीं माँगी... किसने सुनी मेरी चीखें? सुनी किसी ने? पड़ोसी मेरी सिसकियां सुनकर कमरे और खिड़कियां बंद कर लिया करते थे। दिवारों पर मैंने दर्ज की है अपनी भूख और पीड़ा... पर दीवारें तो दीवारें होती है... कहाँ बोला करती हैं वे... पर इन दीवारों के अंदर और बाहर भी कहाँ बसते हैं इंसान... साले सब के सब जानवर... किसी को कोई मतलब नहीं, कोई मरे या जिये क्या फर्क पड़ता है? ...पर ये दो टांगों का जानवर बहुत हैवान है... बहुत ज्यादा। और साला ये भगवान भी कहाँ होता है? कभी सोचना रोज के अपने स्वार्थों से फुर्सत मिले तो... जिस्म के दर्द से भी कहीं बड़ा दर्द होता है... दिल पर लगे जख्म का... काश कोई मेरे इस दर्द तक कोई पहुँचे... काश किसी को यह पता चले कि रिश्तों का खून... हवस की पीड़ा... भूख... प्यास... हैवानियत... दरिंदगी... और माँ-बाप की हर पल... हर क्षण की याद में बस मौत का इंतजार कैसा होता है... काश की पत्थर बोलते और तुम सब पत्थरों में भी एक दिल होता... काश कि मैं पैदा ही नहीं होती... काश कि ना गरीबी होती... ना भूख... भूख शरीर की भी!
दिन की शुरुआत होती है तुझीसे फिर धीरे-धीरे तू घुल जाती है मुझमें यूँ, शहद की मानिंद दिन भर जुबाँ पर मिठा स्वाद लिए रहता हूँ मैं भटकता फिर शाम होते-होते पता नहीं, कब, कैसे स्याह बदली बन छा जाती है मुझ पर फिर रात भर झड़ी का इंतजार प्यास है कि कमबख्त बुझती नहीं
आँख मलते हुए सूरज रात का कंबल फेंक जैसे ही पूरब से झांकने लगा, मेरे गांव का नजारा देख वह चिढ़कर बोला- क्या फिर बुधवार आ गया? उसका मेरे बचपन से लेकर या तबसे जबसे वह मेरे गांव को रोशन करता रहा हो, सवाल होता होगा- ये बुधवार को इस गांव के लोग मेरे जागने से पहले ही क्यों जागकर इतनी हड़बड़ी में रहते हैं? मुझे तो थोड़ा बड़ा होने पर यह समझ आ गया कि मेरे गांव के पास वाले कस्बे जीरापुर में बुधवार को हाट होता है, लेकिन बेचारे सूरज को तो शायद ही अब तक पता चल पाया होगा कि हाट क्या बला है और इसके लिए तमाम गांवों में क्यूं हलचल मचने लगती है? मैंने जबसे समझ विकसित की, गांवों में हाट के लिए लोगों में एक अद्भुत जुनून पाया है। ऐसा नहीं है कि पास के बड़े कस्बों में जाकर कभी भी खरीदी करने की सहूलियत ग्रामीणों के पास नहीं होती है। हर शहर में स्थायी दुकानें होती है। वस्तुओं के दाम भी लगभग वही... पर मैं सोचता हूं कुछ तो बात होगी हाटों में कि हाट वाले दिन ग्रामीणों का हुजूम उमड़ा चला आता है। वक्त के साथ हाट परंपरा मरी नहीं उल्टे ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित ही हुई है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में सारे लोग हफ्ते भर की खरीदी और तफरिह करने के लिए इसी दिन का इंतजार करते हैं। यहां तक की हाट वाला दिन अनऑफिशियली उस क्षेत्र के अवकाश का दिन होता है। मजदूर वर्ग उम्मीद में होता है कि मालिक या ठेकेदार आज उसे निराश न करें और हाट में खरीदारी के लिए कुछ पैसा दे दे। इधर बस, टेम्पो, ट्रेक्टर आदि वाहन मालिक भी सुबह से ही सवारियां ढोने की पूरी तैयारियों में होते हैं। मंगलवार रात से ही जीरापुर में चहल-पहल शुरू हो जाया करती है। आसपास के सैकड़ों गांवों से मवेशी खरीदी-बिक्री के लिए पहुंच जाते हैं। उधर कपड़े, बर्तन, जूते-चप्पल, खिलौने, चाय, मिठाई, सब्जियों, सौंदर्य प्रसाधन, गोदने वाले अपने-अपने स्थान पर आ जमते हैं। छोटी-छोटी दरियों, चटाइयों और टेंट के नीचे दुनिया-जहान की सामग्री सज जाती है। सालों से देखता आ रहा हूं पसीने से सने चेहरे और एक-दूसरे को धकियाते लोगों को हाट में खरीदी करते और गपियाते हुए। ...पहले मुझे लगता था-क्या बेवकूफी है। वही सामान, वही किमत फिर ऐसी मारामारी क्यूं? क्या मिलता है इन लोगों को हर हफ्ते यह बेवकूफी करने में? ...पर जब मैं भी घर का सामान खरीदने लायक समझ वाला हुआ, इस बेवकूफी में शरीक हो गया। ...क्योंकि यहां मुझे सामाजिकता, हास्य, सामंजस्य, प्रचार, मनोरंजन जैसे कितने ही रस कुछ घंटों में ही मिल जाते हैं, तो फिर कोई इतने मजे छोड़कर बोरिंग सी खरीदारी क्यों हाट के इतर दिनों में करेगा?
शुक्र है नहीं करता तेरा ऐतबार वर्ना तेरे इंतजार में एक नहीं हजार बार मरता गम के चिरागों से रोशन है जिंदगी मेरी आखिर कब तक खुशियों की चाह में अंधेरे में बसर करता चलता हूँ रोज अकेला शाम तक कारवाँ साथ होता तू ही बता कब तक तेरी कुरबत की खातिर बियाबान में भटकता रहता सोचता हूँ छोड़ दूँ तुझे अपने हाल पे पर कमबख्त, तेरा वजूद रगों में मेरी लहू बन हरदम दौड़ा करता
ये तेरा असर है कि दर्द भी अब भाता है मुझे भटकता हूँ सहरा में मगर चश्मों की नहीं ख्वाहिश मुझे मर जाने दो यूँ ही प्यासा दो बूँद जो पानी दे अब तो वह फरिश्ता भी लगे है दुश्मन मुझे डूबा हूँ यूँ समंदर में तेरे किनारों की अब कहाँ चाह मुझे कभी होता था मुट्ठी में जहाँ अब तो ये दुनिया लगे पराई मुझे डराता था जो बियाबान कभी चप्पा-चप्पा लगे है अब वाकिफ मुझे जख्मों की है बस इतनी-सी रजा मरहम के लिए ही सही तू बस छू दे मुझे देखना एक दिन ऐसा भी होगा दर्द के सहरा में होगी कश्ती मेरी और तू दे रही होगी आवाज मुझे फिर से बात होगी तेरी-मेरी आँखों में मेरी आँखें डाल तू कहेगी फिर कभी छोड़कर न जाना मुझे
वो दोनों हमेशा ही साथ रहे हैं। विश्वास को याद नहीं की कभी वह उसके बिना रहा है। शायद जबसे उसने होश संभाला था, तब से ही वह परछाई की तरह उससे चिपका रहा। सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते हर वक्त। विश्वास ने अकेले में उससे एक बार पूछा भी- क्यों तू मुझे कुछ देर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता। वो हँसा, फिर जवाब देने के बजाय सवाल उछाला- क्या वाकई में तू अकेला होना चाहता है? विश्वास जानता था- वो कभी उसके बिना जी नहीं सकता। बस उसने तो यूँ ही सवाल उछाल दिया था। उसके बाद कभी न तो विश्वास ने इस तरह का कोई सवाल किया, ना ही उसने भी कभी पलटकर पूछा कि क्यों रे, तूने उस दिन ऐसा क्यों पूछा था? विश्वास ऐसे ही बड़ा होता गया और विश्वास के साथ वो भी लंबा-चौड़ा होता गया। विश्वास जब भी कभी आईने में खुद को देखता, हमेशा खुद को उससे कमतर पाता। तब वो बोला करता- पगले, मैं ही तो तू हूँ और तू ही तो मैं हूँ। फिर वो विश्वास की आँखों में आँखें डालकर बोलता- देखना, एक दिन तू राज करेगा... राज...। करेगा ना। ...और विश्वास कभी भी इंकार कर न पाता। स्कूल के दोस्तों के साथ जब विश्वास मस्ती कर रहा होता, क्लास चल रही होती, या वह यूँ ही सड़क पर मटरगश्ती कर रहा होता वह साथ बना रहता, कभी नहीं टोकता... अक्सर तो वह भी विश्वास के कंधे पर हाथ रख उसकी मौज-मस्ती में खुद को उड़ेल लेता। विश्वास जब सोने जाता तो वह उसका सिर सहलाता, आँख खुलते ही उसका मुस्कराता चेहरा नजर आता। उससे कई बार पूछा भी कि क्या कभी तू सोता भी है? वह हमेशा ही खिलखिला देता इस बात पर। फिर रहस्यमयी ढंग से विश्वास की ओर देखता और कहता- तुझ पर नजर रखता हूँ मैं। कहीं तू मुझे छोड़कर भाग गया तो? विश्वास कहना तो हर बार चाहता कि तेरे बिना मैं कहाँ जाऊँगा? कौन है जो मुझे इस तरह जानता है? शायद इतना तो मैं भी खुद को नहीं जानता। ...लेकिन यह सब कहने को मौका उसने कभी नहीं दिया। शायद वो इमोशनल नहीं था या हो सकता है वह भावनात्मक उद्वेलन से बचता रहा हो। उसी का ही कमाल था कि कभी विश्वास का आत्मविश्वास नहीं डोला। स्कूली लाइफ से निकलकर कॉलेज तक के सफर में विश्वास के कई दोस्त बदले। ऐसा नहीं है कि स्कूली दोस्तों से उसका नाता बिल्कुल ही टूट गया। बस मेलजोल कम हो गया। ...पर वह वैसे ही चिपका रहा। सुबह गुड मॉर्निंग विश के बाद देर रात सोने तक वह सतत विश्वास के साथ बना रहता। बड़े मजेदार दिन गुजर रहे थे। उसके साथ के कारण विश्वास को लगता था कि दुनिया मुट्ठी में है। जहाँ भी वह जाता था छा जाता था। विश्वास का कॉलेज का सफर शानदार रहा। मार्कशीट देखकर उसके पेरेन्ट्स् बहुत खुश थे। उन्हे यकीन था कि बेटे को किसी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छा जॉब जरूर मिल जाएगा। ...लेकिन जब रिजल्ट आया तब विश्वास को उसने कहा था कि मॉम-डेड को बोलना कि वह और पढ़ना चाहता है। उसका लक्ष्य मल्टीनेशनल की घसीटा लाईफ नहीं है। आर्मी है उसका पेशन तो। हालाँकि वह भी यही चाहता था, लेकिन पेरेन्ट्स् को कैसे कहे? खैर, विश्वास ने उसे समझाया कि यार, आखिर हमारी भी घरवालों के लिए कुछ ड्यूटी है। वह कैसे उनके इमोशन्स हर्ट कर सकता है। तब उसने विश्वास को काफी समझाया था कि यार साफ-साफ बोल दे, वैसे भी तू इतना तो कमा ही लेगा कि अच्छे से गुजर हो जाए। ...लेकिन विश्वास पेरेन्ट्स् को कुछ नहीं कह पाया और उसने मल्टीनेशनल में जॉब सर्च करना शुरू कर दी। उसने विश्वास को कभी कुछ नहीं कहा। हाँ, वह सारा दिन पहली बार गुमसुम नजर आया। अगले दिन हालाँकि वह वैसा ही चुस्त-दुरुस्त था। विश्वास ने उससे कहा- सॉरी... वो बोला- यार, सॉरी मत बोल। शायद वह आहत था। कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे। फिर वह धीरे से बोला, पता है कल तूने विरोध खुद से विरोध किया। हालाँकि इसका अधिकार है तुझ, लेकिन इसकी आदत मत बना लेना। विश्वास चुप रहा। वह उठा और विश्वास को गले लगाते हुए कहा- मैं तुझे हारते हुए नहीं देख सकता। तू जीतने के लिए बना है, बस यकीन रख। विश्वास ने सारी तैयारियाँ की हुई थी। उसने आईने में खुद को देखा। टाई ठीक की, ट्राउजर, शर्ट, शूज सब व्यवस्थित नजर आए। एक बारगी सारे डॉक्यूमेंट भी देख लिए। ऑफिस में दाखिल होते ही सूट-बूट में उसके जैसे ही और लड़के भी नजर आए। हालाँकि विश्वास जानता था कि केवल उसका ही इंटरव्यू नहीं होगा। इतनी बड़ी कंपनी है और पैकेज भी काफी बढ़िया है तो कॉम्पटीशन तो होगा ही। दो-तीन लड़कों के बाद विश्वास का नाम पुकारा गया। वह एक गहरी साँस लेकर उठने को हुआ तो उसने कंधे पर हाथ रखकर कहा- जो भी पूछे पूरे आत्मविश्वास से जवाब देना। मैं वहाँ रहूँगा तो सही लेकिन देख ही सकता हूँ, चाहकर भी मदद नहीं कर सकता। विश्वास के सामने कंपनी के प्रेसिडेंट एक पैनल के साथ बैठे थे। सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू हुआ। इंटरव्यू शानदार रहा, लेकिन जब रिजल्ट जब डिक्लेयर हुआ तो किसी और का नाम सुनकर विश्वास को जोरदार झटका लगा। यह विश्वास की जिंदगी की जंग में पहली हार थी शायद। विश्वास रो रहा था और पास में बैठा वो समझा रहा था कि यह महज एक इंटरव्यू था। इसे जिंदगी की लड़ाई से क्यों देख रहा है। चलता रहता है ऐसा। याद रख- तू राज... वह अपना वाक्य भी पूरा नहीं कर पाया था कि विश्वास पागलों का तरह चिल्लाया- बंद कर अपनी बकवास। हर बात तेरी मानता रहा, क्या मिला मुझे? कोई राज करने के लिए नहीं बना हूँ मैं। मुझे एक अच्छी नौकरी चाहिए बस। तू जा किसी और को राज करने के लिए तैयार करना, मुझे नहीं चाहिए ऐसा दोस्त जो मुझे बरगलाता रहे। वह वहीं बैठा रहा गुमसुम। विश्वास उस दिन पूरी तरह टूट चुका था। पहली बार उसने शराब पी और सारे घरवालों के सोने के बाद वह पहुँचा। सारी रात नशे में विश्वास उसे गालियाँ देता रहा और चिल्लाता रहा चले जा मेरी जिंदगी से। हालाँकि नशे की हालत में भी वह उसी के कांधे पर सवार होकर घर पहुँचा था। सुबह विश्वास की नींद काफी देर से खुली। उसने कमरे में नजर घुमाई, वह कुर्सी में धँसा मिला, घूरते हुए। विश्वास ने बुझे मन से गुड मॉर्निंग के साथ सॉरी जोड़ दिया। वह कुछ नहीं बोला। सारा दिन घरवालों ने विश्वास से बात नहीं की। बात ही क्या वे तो विश्वास को देखते ही दूसरे कमरे में चले जाते थे। सारा दिन घरवालों को मनाने और गलती नहीं दोहराऊँगा ये बोलने में बिता। शाम तक सबकुछ नॉर्मल था, सिवाय उसके। विश्वास ने उसे कहा- चल बाहर घूम कर आते हैं। वह बिना कुछ कहे उसके साथ हो गया। दोनों चुपचाप चलते रहे। विश्वास ने इस साइलेंस को तोड़ते हुए कहा- जो हुआ यार उसे भूल जा ना। वह चुपचाप चलता रहा। फिर गहरे बोला- यह दूसरी बार है, जब तू बाहरी कारणों से खुद के ही विरोध में खड़ा हुआ। मैं जानता हूँ तू गलत जा रहा है... पर मैं सिवाय देखने के कुछ नहीं कर सकता... फिर वह हल्के से मुस्कुराया। विश्वास कुछ समझा नहीं... बस उसने इतना भर पूछा- तू नाराज तो नहीं। उसने ना में सिर हिला दिया। इसके बाद विश्वास ने कई इंटरव्यू दिए। वह हमेशा उसके साथ होता। निराशा में आशा जगाने की कोशिश करता। हाँ, उसने फिर कभी ये नहीं कहा कि याद रख... तू राज करने के लिए बना है। वह बस समझा भर देता और कोशिश करता कि उसका यार कभी निराश न हो। आखिरकार विश्वास को सफलता हाथ लग जाती है। हालाँकि उसकी उम्मीदों के अनुसार पैकेज नहीं था, फिर भी विश्वास खुश था और उससे ज्यादा खुश वह था कि आखिर सफलता मिली तो सही। खुशी के मौके पर उसने आँखों में चमक भरकर कहा कि यह तो शुरूआत भर है। तुम्हे आगे बहुत तरक्की करना है। इस पर विश्वास ने फिर उसे उड़ा दिया, बोला- यार बस भी कर, मुझे मेरी लिमिट मालूम है। वह मुरझा गया। विश्वास काफी उत्साह से रोज ऑफिस जाता और उसके साथ वह भी। विश्वास ऑफिस में बहुत व्यस्त रहने लगा। दोनों साथ तो रहते, लेकिन सुबह से शाम तक बमुश्किल ही बात हो पाती। हालाँकि वह अब भी विश्वास के साथ साये की तरह ही रहता था, पर विश्वास अब उसकी बात कम ही सुनता था। उसके ही ऑफिस एक लड़की संभावना भी काम करती थी। विश्वास और संभावना में धीरे-धीरे नजदीकी गहराने लगी। बात प्यार और फिर शादी तक जा पहुँची। एक दिन विश्वास ने संभावना से उसका परिचय करवाया। वह नहीं जानता था कि विश्वास के अलावा किसी अन्य से कैसे बात की जाती है। पूरे समय दोनों ही बातें करते रहे, वह चुपचाप बैठा रहा। कुछ भी बोल नहीं पाया। ऐसा नहीं था कि वह उन दोनों के प्रेम से खुश नहीं था। उसका साथी जब कभी खुश हुआ, वह हमेशा ही उसकी खुशी में सिर तक डूबा रहा। दिनों-दिन विश्वास और उसमें वार्तालाप कम होता जा रहा था। वह जानता था कि जो कुछ भी उसके और विश्वास में घट रहा है, वह गलत है। ...लेकिन वह कर भी क्या सकता था। संभावना और विश्वास की जोड़ी बहुत प्यारी थी। दोनों खुब मजे में थे, लेकिन अब वह बाहर के कमरे में सोने लगा। संभावना को अब भी लगता है कि वह बहुत घमंडी है और वह उसे साथ रखने में कतराती थी। वह विश्वास को कहा करती- तुम्हारे दोस्त में अहं है। वह मुझसे सीधे मुँह बात ही नहीं करना चाहता। विश्वास भी बार-बार यह सुनकर यकिन करने लगा कि उसका दोस्त अहमी है। उसने उसे साथ रखना बंद कर दिया। वह घर के एक कोने में पड़ा रहने लगा। जो खाना बचता वह खाकर गुजारा करने लगा। हाँ, कभी दोस्त को उसने पलटकर कुछ नहीं कहा। वह बीमार रहने लगा, दिन-ब-दिन कमजोर होता गया, लेकिन कभी यह नहीं पता चलने दिया। दिन गुजरते गए और विश्वास-संभावना के प्रेम का एक पुष्प खिला। जिसका नाम दिया गया 'उम्मीद"। वह घुंघराले बालों वाली काफी खुबसूरत लड़की थी। वह सारा दिन उम्मीद को संभालता। अब रात-दिन लड़की ही उसकी आँखों में बस गई थी। उसे उम्मीद के अलावा कुछ नजर नहीं आता था। धीरे-धीरे वह स्वस्थ होने लगा। उम्मीद भी मम्मी-पापा के बजाय उससे ही आ लिपटती थी। बोलना सीखी तो सारे घर में दौड़-दौड़ कर चिल्लाया करती- देखना एक दिन में राज करूँगी... राज...। संभावना यह सुन-सुनकर उत्साह से लबरेज हो जाती थी कि उसकी बेटी देखो दुनिया पर राज करने की तमन्नाा लिए बढ़ रही है। ...लेकिन विश्वास जानता था कि यह शब्द उसके दिलो-दिमाग में डाले जा रहे हैं। ...पर जो शब्द खुद के लिए उसे चुभते हुए लग रहे थे, न जाने क्यों वही शब्द इन दिनों उसे लुभा रहे हैं। उसे फिर से अपना वह दोस्त भाने लगा। ...लेकिन वह जब भी उसके पास जाता, वह उसकी ओर देखता तक नहीं था। कई दिनों तक यूँ ही चलता रहा। आखिरकार विश्वास से रहा न गया। मौका देखकर वह अपने दोस्त को लगभग घसीटता-सा बाहर लेकर आया और रुँधे गले से बोला- क्यों कर रहा है तू मेरे साथ ऐसा? वह बोला- क्या कर रहा हूँ और तुम हो कौन? विश्वास चौंका, हतप्रभ होकर बोला- अपने दोस्त के साथ ऐसा तो मत कर। वह बोला- कौन दोस्त? मैं तो तुम्हे नहीं जानता। विश्वास ने उसके पैर पकड़ लिए, लेकिन वह नहीं पसीजा। उसका चेहरा पत्थर हो चुका था। विश्वास के आँसूओं का उस पर कोई असर नहीं था। वह कठोर आवाज में बोला- जिस दोस्त की तुम बात कर रहे हो, वह कोई नहीं तुम ही थे। वह तुम्हारा -'स्व" था और कोई नहीं था। देखो खुद के अंदर, शायद वहाँ उसकी सड़ी लाश मिल जाए। विश्वास बदहवाश हो चिल्लाया- तुम नहीं जा सकते। मैं इस दुनिया में अकेला मर जाऊँगा। ...लेकिन उसने धकियाते हुए पीठ की और विश्वास के घर में दाखिल हुआ। विश्वास उसके पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया तो देखता है कि उम्मीद निश्चिंत होकर सोई है और वह पास ही बैठ उसे एक टक निहार रहा है। विश्वास कुछ कहता इसके पहले बेटी नींद में बड़बड़ाई- देखना एक दिन में राज करूँगी...। विश्वास दोनों को देख अपने आँसू पोछते हुए कहता है- जरूर करेगी... जरूर... प्लीज... मेरी बेटी का कभी साथ मत छोड़ना... प्लीज...
वो कहती है जरूरत हूँ मैं उसकी काश, कि समझ पाती जरूरत से कहीं बढ़कर है वो डरता हूँ मैं कहीं ये न हो मेरे साथ एक दिन कबाड़खाने में पड़ा मिलूँ क्योंकि, कई जरूरत की वस्तुएँ किसी रोज 'धूल" हो जाया करती हैं हो सकता है कभी फिर, मेरा भाग्य जागे झाड़-पोंछ कर मुझे चमकाये फिर, अपने शो केस में सजाये पर, वो कद्रदान कोई और होगा तू तो नहीं
प्यास वो कतई नहीं जो पानी से ही बुझ जाए तो फिर, क्या है? कमबख्त, तेरे मिलने से दहकती है ना मिलने से और भी भड़कती है मिलो तो, ना मिलो तो हर, हर परिस्थिति में वो, वैसी ही है जिंदा और मैं? अनंत तक भटकते रहने के लिए अभिशप्त डरता हूँ, और चाहता भी यह ऐसी ही, जैसी पहले थी, अभी है बनी रहे मैं जानता हूँ यही, हाँ यही तो है प्यास पर शायद ही समझा पाऊँ तुझे क्या है प्यास!
धीरे-धीरे आसमान से उतर कहीं खो जाने को बेताब ये अस्ताचल सूरज झुंड के झुंड पंछी भी कहीं पेड़ों में हो रहे गुम दिन भर की गर्मी न जाने कैसे हवाओं में घुल ठंडी पुरवाई का रूप ले चुकी दूर कहीं डूबती-सी देवालयों से आती घंटियों की आवाज उस पर सारी प्रकृति को पेंसिल से हल्के-हल्के धूसर करने का षड्यंत्र रोज पूरी कायनात में गौधूली होते ही घुल जाती है शराब और, नशे में डूबा मैं पाता हूँ खुद को तेरे आगोश में फिर न जाने कैसे सब स्याह हो जाता है न 'तू" तू होती है न ही 'मैं" मैं कमबख्त, इसलिए ही हर शाम तेरी तरह और, तू शाम की तरह लगती है रूमानी
मेरी यादों का किंवाड़ (दरवाजा) हर वक्त खुला होता है कमबख्त नहीं चाहता उसमें सरकना पर जिस तरह वह बंद नहीं होता उसी तरह मैं खुद को नहीं रोक पाता किस्मत ही मेरी ऐसी है या सारी किताबें एक हो गई पता नहीं, पर जब भी मैं दाखिल हुआ उस किंवाड़ के पार किताबों के उस समंदर में हर बार, हर बार हाथ आई तेरे ही नाम की किताब पन्नो दर पन्नो लिखी होती हमारी कहानी वो मिलना, साथ चलना पर उन सारी किताबों का क्यों गुम है आखिरी पन्ना?
काश की जिंदगी बनिये की दुकान न हो दो ग्राम खुशी दस ग्राम रोना न हो खुद से उम्मीदों का बोझ अपनों से फायदे की आस न हो जीत क्या, हार क्या तेरा-मेरा वाली बात न हो काश की जिंदगी बनिये की दुकान न हो जानता हूँ हर कोई तौलता है नफे-नुकसान के तराजू में बस बातें ही होती है दिल की हमेशा चलता दिमाग है अक्लवालों की इस दुनिया में इस हद तक रिस गया व्यापार हर रिश्ते की है कीमत हर संबंध का कोई खरीदार कहीं सुना है प्रेम में नहीं होताकोई हिसाब पर, वहाँ भी तो चलता मेरा ज्यादा, तेरा कम कोई तो होगा ऐसा जो नुकसानी का सौदा करे और, फिर कभी मेरा मौलभाव न करे काश की जिंदगी बनिये की दुकान न हो
ख्वाहिशों की गली से
जब भी निकला
अतृप्त, प्यासा, व्याकुल
हताश, निराश ही मिला
वहाँ की हर चीज लुभावनी
आकर्षक क्यों?
सवाल तो यह भी है
वह गली ही क्यों?
फिर भी, हर बार
नई ललक के साथ गुजरता हूँ
कई खुशियों को काँख में दबाए
पर, कमबख्त हर बार होती है कसक
कुछ छूट गया है उस गली में
अगली बार फिर जाऊँगा
चुन लाऊँगा तमाम जगमगाहट
पर, जब भी जाता हूँ
बुझा ही लौटा हूँ
क्यों, उठते हैं
नए अरमान दिल में
मैं फिर भटकने को मजबूर
ख्वाहिशों की गली में
काश कि मैं
न मजदूर होता, न मालिक
न ग्राहक, न ही व्यापारी
दरोगा होता न चोर होता
न राजा, न प्रजा
रक्षक या भक्षक भी नहीं
क्या नेता, क्या मतदाता
अफसर, कर्मचारी भी नहीं
फिर भगवान, राक्षस भी क्यों
काश कि मैं
एक 'इंसान" होता
तब शायद
किसी आँख में न आँसू होता
न ही कहीं कोई भूखा सोता
काश
कि मैं इंसान होता
यह बता तीसरी कक्षा की है। वह मेरे पास बैठती, क्लास टीचर के मना करने के बावजूद! वह मुझसे बात करते हुए टीचरों से डाँट खाती, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। कई बार दूसरे बच्चे पूछते भी- तू उसके पास ही क्यों बैठती है? जवाब होता- वह मुझे अच्छा लगता है। मेरा बेस्ट से भी बेस्ट फ्रेंड है वो। कई बार मुझे अजीब लगता, लेकिन मुझे भी तो वह अच्छी लगती है। ब्रेक होने पर टिफिन भी मेरे साथ ही खाती।
एक दिन जैसे ही ब्रेक हुआ, वह बोली- रूकना, तुझसे बात करनी है। सारे बच्चे चले गए, तो बोली- आय लव यू! मैंने भी हँसकर कहा- आय लव यू टू! वह बोली- पगले, मॉरल साइंसवाला नहीं, फिल्मों वाला! मैं भी हड़बड़ा गया। वह हँसी और गाल पर किस करके भाग गई।
न जाने कितनी बार वह 'किस" मेरे जेहन से उठता है और गाल को गीला कर जाता है। वही ताजा सा अहसास। अद्भुत!
मैं स्कूल के लिए अपने गाँव से पास ही के कस्बे जीरापुर जाया करता था। नौ किमी का सफर बस में तय होता था। बस हमेशा ही यात्रियों से ठसाठस भरी होती थी, जैसे अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में होती है। मेरी बोनट पर परमानेंट जगह हुआ करती थी। उस जगह को रोककर लाने का काम ड्रायवर करता था। मुझे अच्छे से याद है बस का नाम मोती बस और ड्रायवर को सब मामा-मामा कहते थे। वह मुँह में हमेशा पान ठूँसे रखता था। बताते हैं कि वही बस का मालिक भी था। मामा को पता नहीं मुझसे क्या लगाव था कि वह नौ किमी बस मुझसे ही बातें किया करता। मैं कई बार उचक-उचक कर हॉर्न बजाया करता, वह कभी नाराज नहीं होता। चलती गाड़ी में कई बार उसकी सीट पर भी घुस जाता। बकवास सा एक टेपरिकॉर्डर था, जिसमें मेरी पसंद की टेप चला करती। वह पान भी खिलाता और कभी टॉफी भी। अब भी अक्सर मेरे सामने वह मामा आ जाता है और कई बार गुजरती बस को देखता हूँ तो एक हूँक सी उठती है कि दौड़कर उसके बोनट पर बैठ जाऊँ।
स्कूल और बस के टाईम में सामंजस्य नहीं बैठ पाने के कारण मुझे और मेरे भाई को साइकल पर छोड़ने की व्यवस्था की गई। हमें गाँव का ही एक व्यक्ति भागीरथ लेकर जाया करता था। एक दिन सुबह उसके आने में देरी हो गई। पता नहीं मुझे क्या सूझा और मैं उसे बुलाने घर जा पहुँचा। वह तैयार ही हो रहा था। उसने कहा- चाय पी लूँ, फिर चलते हैं। मैं उसके घर में एक टूटी खाट (पलंग) पर बैठ गया। उसने कहा- आप पियोगे? मैंने हाँ कह दी। वह बोला- दूध तो है नहीं, यहाँ तो काली चाय मिलेगी। मैं कुछ समझा नहीं। वह कपड़ा लेकर चाय छानने लगा। उसके पास एक ही गिलास था, जिसमें कुछ काला पेय उड़ेला। वह गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया और खुद ने वही लौटा रखा था उसमें अपने लिए वह पेय छान लिया। मैंने कहा- यह चाय है? वह बोला- ये गरीब की चाय है। अजीब लगा कि चाय में भी अमीरी-गरीबी होती है! एक घूँट में पूरा मुँह कसेला हो गया। जैसे-तैसे थोड़ी सी चाय पी और गिलास रख दिया। आज भी अचानक ही मुँह कसैला हो जाता है। साथ ही उस घर की एक-एक चीज आँखों के सामने घूम आती है।
ऑपरेशन थियेटर के बाहर डॉक्टर की गोद में आती बेटी, उसकी गोल-गोल मुझे घूरती आँखें... शादी के फेरे हो जाने के बाद रिशेप्शन के लिए जाते वक्त मेरी पत्नी का अचानक ही कार में ताली बजाकर कहना- आज तो खुब मजा आया... दादी का डेंटल हॉस्पिटल में अपना नंबर आने पर मेरा हाथ पकड़कर डर के मारे कहना- भाग चल, भाग चल...
कई-कई किस्से और यादें हैं, जिन्हे घटे बरसों बीत गए... लेकिन ये अब भी याद आती है तो लगता है जैसे अभी-अभी तो घटा है सबकुछ! है, ना! अब कुछ रोमांचकारी और मजेदार। जिन घटनाओं को हम शिद्दत से जीते हैं, उन्हें वक्त भले ही भूला दें... लेकिन जैसे ही कोई उत्प्रेरक जेहन में दाखिल होता है, वे वैसी ही तरोताजा हो जाती है... जैसे अभी की ही तो बात है!
बुरे वक्त में
याद आ जाता है ईमाँ
वरना, यह भी तो
खूँटी पर टंगी चीज है
बुरे वक्त पर तो
खुदा भी नजर आता है
वरना, वह भी तो
दीवारों में कैद है कहीं
सच्चे दोस्त की परख
कराता है बुरा वक्त
वरना, कौओं में
हंस भी कहाँ नजर आता है
खुद में झाँकने को मजबूर करता है
यह बुरा वक्त
वरना, इस भीड़ के शोर में
'मैं" की आवाज कहाँ सुनता है कोई?
हौंसला, जोश, जुनून
संघर्ष, जीवटता
ऐसे अनगिनत शब्द
जीवन में घोल देता है
यह बुरा वक्त
मेरी प्यारी बेटी,
दो साल, चुटकियों में गुजरे। मेरी जिंदगी का अद्भुत समय। ऑपरेशन थियेटर के बाहर जब पहली बार तुझे गोद में उठाया था, तब तू आँखें फाड़कर मुझे देख रही थी। हमारी पहली मुलाकात... आँखें छलकी... सोना का शुक्रिया...!
पता है बेबी, तुझे में सपनों में देखा करता था। सोचा करता था। कैसी होगी तू, क्या कर रही होगी, माँ को जानती होगी, पर मुझे कैसे जान पाएगी...! लेकिन पहली ही बार में तूने मेरे सारे सवालों का जवाब दे दिए। बेहद खूबसूरत है तू, बिल्कुल मेरे सपनों में आती रही छोटी सी परी समान।
तब से लेकर अब तक मुझे यही लगा कि सपने देखना चाहिए। सपने ही तो हकीकत बनते हैं। ...तूने ही इस बात का यकिन दिलाया कि हाँ, सपने ही हकीकत बनते हैं। आमतौर पर बच्चे एक महीने में नजरें स्थिर करने लगते हैं, पर तू शुरू से ही मुझे देखती मिली। फिर चार महीने में तेरा इगो भी देखा। तेज आवाज शुरू से ही तुझे नापसंद रही है। किसी की नाराजगी का अहसास तूझे जब छ: महीने की थी, तबसे होने लगा। इस बात ने मुझे काफी चौंकाया। पहली करवट भी मेरे सामने ही तूने ली और वह इस तरह ली, जैसे करवट लेना तेरे लिए सामान्य बात हो। बड़ी आसानी से... फिर घुटने के बल चलना, सरपट दौड़ना और फिर धीरे-धीरे खड़े होना... सब ताउम्र के लिए तूने मेरे जहन में दर्ज करवा दिया।
कुछ महीनों की थी, जब तेरी माँसी और सोना ने कान छिदवा दिये। सफेद मोतियों के बीच एक लाल मोती... पता है बेबी... तू बहुत दहाड़े मारकर किसी भी वक्त रोने लगती थी। करीब सवा साल तक यह सिलसिला चला... और, रात को तो यह रोना जानलेवा ही लगता था। उस वक्त समझ नहीं आता था कि कैसे तुझे चुप करें... क्या-क्या नहीं करते थे... बोलना तो जानती नहीं थी तो लगता था हो सकता है पेट दुख रहा हो, दाँत आ रहे हो तो वहाँ दर्द हो, भूख तो नहीं लग रही... फिर तमाम तरह के प्रयोग... तेरा भोंगा चालू... नजरें भी उतारी जाती...! मैं कभी नजर लगने जैसी बातों को नहीं मानता, पर तेरे मामले में मानता हूँ... कई बार खुद से पूछा भी... जवाब भी मिला- कहीं सच में नजर लगती हो तो!
पहला शब्द तूने 'माँ" ही बोला था। बड़ा मजा आया, लेकिन तुझ पर गुस्सा भी। थोड़ी मुश्किलों से ही सही 'दाता" भी तो बोल सकती थी। अकेले में कई बार दोहराया भी कि दाता बोलने में तुझे कहा परेशानी आती होगी...
काश! दाता की जगह मुझे 'माँ" ही कहा जाता होता। खैर तूने धीरे-धीरे दाता बोलना भी सीख लिया... मैं कई बार तुझे कुछ सिखाना नहीं चाहता हूँ... सोचता हूँ तू अपने आप दुनिया को जाने... समझे और जिंदादिली से जिए!
तेरे पैर कमाल हैं। घुंघरूओं वाली पायल में तुझे ठुमक कर चलते देखना... फिर तेरा दौड़ना... कमाल लगता है। जब तू खड़ी होने लगी थी, तब कोई भी गाना सुनकर तेरा डोलता हुआ डांस... कैमरे को देखकर शुरू से ही पोज देना... कहाँ से सीखा तूने? लगता है तू जन्मजात ब्यूटी कांशस है। तभी तो बिना बालों वाली लड़की किसी के भी घने बाल देखकर सबसे पहले उन पर ही प्रतिक्रिया देती है और खुद का सिर छूने लगती है। यह तब की बात है जब तू बोलना नहीं जानती थी, जब बोलने लगी तो किसी बच्चे के लंबे बाल देखते ही खुद के सिर पर हाथ लगाते हुए बोलती-बालऽऽऽ
क्रीम, पाउडर, काजल, बिंदी, चूड़ियाँ, ढेंगलर, क्लिप, कंघा, डियो सबकी जन्मजात दीवानी लगती है। खिलौनों से पता नहीं क्या दुश्मनी है, वे बस आते-जाते ठोकरें मारने के लिए ही बने हैं। हाँ, लखन दादा का पहले जन्मदिन पर दिया डूबीसिंह तेरा फेवरेट है। इस एक साल में तू हमेशा ही उसे टांगे-टांगे घूमी, सोते समय भी उसे अपने साथ रखती है। ...और ब्रूनो पर भी थोड़ी मेहरबानी कर लेती है।
हर सवाल पर कोनफिडेंटली 'हाँ" कहना सोना से ही सीखा है। ये बड़ा मजेदार लगता है मुझे। एक बार तू अपने शूज ढूँढ रही थी। हमने कहा- सुन, जूते बालकनी में रखे हैं, ले आ। तूने बड़ी शान से हाँ कहा और कमरों में घुमकर आ गई। फिर कहा- बालकनी, फिर वहीं- हाँ और घूम-फिरकर वापस, फिर कहा- बालकनी, फिर वही- हाँ। हमें बड़ा मजा आया। आखिरकार मैं तूझे बालकनी में ले गया और बताया कि इसे बालकनी कहते हैं, तब भी वही सबकुछ जानने वाला 'हाँ", जैसे तुझे बालकनी पता थी।
एक बात और बहुत मजेदार लगती है तेरी! तुझसे पूछो कि कितने बजे हैं, जवाब- स्टाइल के साथ...पाँचऽऽऽ, कब जागी, पाँच... कितनी रोटी खाई, पाँच... हर सवाल में पाँच!
तेरी खम्माघणी करने की अदा पर जान लूटा देने का मन करता है। वो झुकना, प्यारे से हाथों को आपस में मिलाना... कितना सलोना है। हालाँकि कई बार तुझसे खम्माघणी करवाने को लेकर मैं विरोध भी झेल चुका हूँ कि बेटी को क्या बार-बार झुका रहे हो। अभी से उसे स्त्रीबोध क्यों करा रहे हो? पर, मैं तुझे जितना प्यार करता हूँ चाहता हूँ सब तुझे उतना ही चाहे... मेरी नजर में गरिमामय स्त्री थोड़ा सा झुककर दुनिया को कदमों में झुका सकती है।
तू बोलना सीखी तो मुझे भी 'मम्मा" ही बुलाती थी। यह अजीब लगेगा, लेकिन मुझे हल्का सा उस वक्त तेरी माँ सा अहसास होता था। अब कैसे, यह तो शायद मैं खुद न समझ पाऊँ!
एक बड़ी कार दुर्घटना भी मुझसे होते-होते बची। तब तू पीछे बैठी थी, लेकिन शायद तू समझ गई थी कि कुछ गड़बड़ है और चिल्लाई थी दाताऽऽऽ
स्टीयरिंग छोड़कर तुझे संभालू अचानक दिल ने यह कहा था। ...लेकिन उसी पल लगा कि मैं कार को पलटने से बचा सकता हूँ और हम बच गए। अब भी मुझे लगता है कि तेरे लिए बचा हूँ मैं!
बेबी, जब तुझे ये पत्र लिख रहा हूँ तो एक के बाद एक कितनी ही बातें और यादें तेजी से आ-जा रही है। उन भावनाओं को पेज पर उतारना नामुमकिन है।
तेरे किस...छुअन...मस्ती...खिलखिलाहट... नकली हँसी... नाराजी... मम्मा की दुमछल्ली बनना... नानी की गोद में जाकर हमें बाय कहकर टालना... अजीब सा फ्लाइंग किस... दादी का सिखाया गाना... ओए कहना... शादी करनी है मुझे... इस माँग के साथ मम्मा से फोन लगवाना... किससे? तो दाता से कहना...
ढेर सारा प्यार...
एक बुजुर्ग की आँखों में
अकेलेपन की बूँदें छलकी देख
दिल बैठ-सा गया
कैसे भरूँ उनका वो सूना कोना
जहाँ कभी रहा करते थे 'अपने"
जिन्हें, जालिम वक्त ने
एक-एक कर चुरा लिया
जिसने ताउम्र का वचन दिया था कभी
वह अब यादों में ही निभा रही है साथ
टीस उठती है कहीं भीतर
आखिर क्यों मानते हैं हम
बेटियों को पराया धन
और, बेटा
जब दुनिया निन्यानवे के फेर में है
तो वह 'बेचारा" क्या करे?
भाई-भतिजों को कैसे दोष दिया जाए
सबकी अपनी दुनिया, अपने बंधन
उनके लिए
शायद कुछ नहीं कर सकता मैं
अनायास ही, मोबाइल पर
एक नंबर डायल हो आया
हैलो सुनते ही मैंने कहा
आई लव यू दाता (पापा)
नींव तक चला गया पानी
पैंबंद छत पर लगाता रह गया
जब धँस रही थी दीवारें
सामान समेटता रह गया
दिल पर लगा ज़ख्म
दर्द की दवा लेता रह गया
निकला था मीलों लंबे सफर को
बियाबान में भटकता रह गया
कई कयामतों से होकर गुजरा
मगर तेरे एक झोंके में बिखर कर रह गया
गलियों-गलियों खोजता रहा
जब मिली तू तो खुद को खोकर रह गया
शुक्र है खुदा का
जो कुछ हुआ, मेरे साथ हुआ
होश में लाने के लिए जब तूने छूआ एक बार फिर
तेरा मैं होकर रह गया
सारा-सारा दिन
हरा, नीला
पीला, गुलाबी गुलाल
मन में लिए घूमता रहा
जब-जब नजरों के सामने
पाया तुझको
जब्त किया खुदको
उस पल की ताक में
जो बस हमारा हो
यूँ ही बीत गया
होली का हर पहर
और, तू
दिन, दिन भर
बातों के रंग घोलती रही
मुझे सराबोर करती रही
तुम नहीं समझोगे मुझे
कहती है वो
झगड़ती भी है
बिन पानी मछली-सी
तड़पती भी है
लौट आती है जैसे
चिड़िया अपने नीड़ में
वैसे ही, मेरी बाहों में समाँ
कहती है वो
एक तुम ही तो हो
जो समझते हो मुझे
कैसे बयाँ करूँ तुझे
मैं हाल-ए-दिल
शोर में गुम है तू कहीं
और, मुझे इंतजार खामोशी का
की है, कईं बार
कोशिश मैंने
लेकर आया भी
कोलाहल से बाहर निकाल तुझे
तब न जाने कैसे
तेरे 'मौन" के शोर में
दब गई मेरी जुबाँ
जानता हूँ
सारी राहें जाती है तुझ तक
कहीं खड़ी भी होगी तू
मेरे ही इंतजार में
साल-दर-साल
चुनता हूँ इक नई राह
उम्मीद बस होती है यही
इस बार पा ही जाऊँगा तुझे
कमबख्त कितने ही मोड़ आए
कितनी ही राहें बदलीं
बस, इसी आस में
हर राह जाती है तुझ तक
कहीं कर रही होगी
तू, मेरा इंतजार
ऐसे ही
हर क्षण
तुझ में ही भटक रहा हूँ
तुझे ही पाने की चाह में
उनिंदी सी उस सुबह
ब्रश करते हुए
आईने में जब खुद को टटोला
हल्की-सी निकल आई दाढ़ी में
दो सफेद मेहमान भी नजर आए
मैंने मुस्कुराकर कहा-वेलकम
वो बोले-उमर के निशाँ है प्यारे
अब तो बड़ा हो जा
अभी तो हम दो हैं
आगे देखता जा, होता है क्या
तभी ताजे झोंके समान
'युगी" आकर पैरों से लिपट गई
बोली- बॉलऽऽऽ
फिर मैं घंटों बेटी के साथ
बच्चा बना रहा
मुझे पता है
हर चीज छूट जाएगी
नौकरी, साख
धाक, पैसा, इज्जत
नहीं छूट पाएगा तो बस
तेरा चढ़ा रंग
फिर भी
जानकर भी अनजान बना 'मैं"
दौड़ रहा अंधी गलियों में
उन कुंठित ख्वाहिशों के पीछे
जो ले जा रही तुझसे दूर
जबकि, लौटकर आना ही है
तेरे पास
आकर पूछूँगा, तू नाराज तो नहीं
मुझे पता है
तू गुस्से में होगी
फिर भी कहना, नहीं
और, चढ़ा देना
रंग की एक और परत
कम्प्यूटर, फोन
सामने लगा पोस्टर
पेन, मोबाइल
कुर्सी, पानी की बोटल
यहाँ तक कि 'मैं" भी
सब, सबकुछ संवेदनशून्य
निराश, हताश
काश, तू छू दे मुझे तो 'सबमें" जान आ जाए
'मैं" को परे रख
अब देख खुद को
धँस, और धँस
क्यूँ घबरा गया
अब फिर से
समा जा 'मैं" में
तेरी औकात नहीं
खुद की 'गंद" समेटने की
सालेऽऽऽ
जिये जा तू
'मैं" के सैप्टिक टैंक में!
एक दिन
उसमें ही दफन हो जाना
पर, कमबख्त
तू है ही रक्तबीज
तेरी मिट्टी से
कई 'मैं" फूट आएँगे
जन्म से लेकर मौत तक
सजा है बाजार
जहाँ जिस्म से लेकर
वैभव तक होती है नुमाईश
कभी खुद इंसान बनता है वस्तु
कभी वस्तु हो जाती है इंसान से बढ़कर
कुछ बिकते हैं सरे बाजार
कुछ की लगती है बंद कमरों में बोली
हाँ, इस दौर में भी
कहीं-कहीं
इंसानों की तरह दिखता
एक 'इंसान" नजर आ जाता है
वह टूट जाता है, झुकता नहीं
एक नष्ट होता, दूसरा भी आ जाता
किसी 'तिलचट्टे" के समान
पता नहीं कैसे?
अनंतकाल से अब तक
है उसका वजूद
वह खुद को कहता है 'स्वाभिमानी"
पर, वह किसी काम का नहीं
परिवार, रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी
सब रहते हैं उससे परेशान
लेकिन, वह जीता जाता है
यही सोचकर
शायद, वह देश, समाज
परिवार के कभी काम आ सके
खाली होना भी
खलता है
और, व्यस्त होना भी
सोचता हूँ
दिमाग में उग आए जंगल की
थोड़ी काँट-छाँट कर दूँ
पर, मुझे कहाँ पसंद है
व्यवस्थित बगीचा
सोचता हूँ
उलझनों की ऊहापोह से निकलकर
जी लूँ, कुछ देर अपने साथ
पर, मैं खुद को ही क्यों खलता हूँ?
तंग आ गया हूँ
हर वक्त के सफर से
पर, सुस्ताने से कहाँ राहत पाता हूँ
सोचता हूँ
कर दूँ भीड़ में इस कदर गुम
ढूँढने से भी ना मिलूँ खुद को
पर, कमबख्त!
वहाँ भी तो अकेला होता हूँ
कहीं मिलेगा ऐसा एकांत?
जहाँ अकेले रहकर भी
अकेला ना रहूँ
जहाँ, अकेला ना रहकर भी
निपट अकेला हो जाऊँ
थक जाना चाहता हूँ इस कदर
दिल, आत्मा, शरीर सब
एकसाथ चूर हो जाएँ
धीरे-धीरे 'शून्य"
गहरे, और गहरे
मुझमे, मैं उसमें
समा जाऊँ
पर, कमबख्त!
ऐसा भी कहाँ होता है!
कई ख्वाबों की रहगुजर के बाद
एक राह बुनी है मैंने
वह तुझ तक ही तो जाती है
बस, तुझ तक ही
अभी चलना शुरू ही किया है
आकर मिली है कुछ तितलियाँ भी
जो बात कर रही है फूलों की
पंछियों ने भी आकर की है
तारीफ उस हँसीं मंजर की
मछलियाँ भी झील से झाँक
कह रही है खुशामदीद
कहीं से कोयल ने
छेड़ी है इकतार
जुगनूओं ने टाँकी है
मदहोश रोशनी की लंबी कतार
मस्ती के इस आलम में
देख आ पहुँचा मैं तेरे आँगन में
छोड़ दो, दूर हटो
अब ना फेंकों मुझे फिर बियाबान में
जहाँ बात न हो तेरी-मेरी
बिखरी हो दुनियादारी
खुलेआम ख्वाबों का कर कत्लेआम
की जा रही हो सौदागरी
कैसे, जी पाऊँगा मैं?
तू ही बता!
जो राह बुनी है
वह, बस तुझ तक ही तो आती है!
तोहमतें लगाने वाले
देखो 'फरिश्ते" हो गए
उनकी जुबाँ से कितने ही
उजले दामन दागदार हो गए
कैसे पकड़े कोई गिरेबाँ उनकी
कदम-कदम पर वो ही वो हो गए
चुप रहकर भी नहीं बच सकता कोई
वे किचड़ उछालने में इतने माहिर हो गए
क्या हो इनका इलाज, नहीं आता समझ
ये तो लाइलाज मर्ज हो गए
अर्जी लगाई है इनकी
मगर, खुदा का इंसाफ तो देखो
दोज़ख के दरवाजे भी इनके लिए बंद हो गए
भुगतना होगा ताउम्र यूँ ही
सोचकर ही उम्र के आधे बरस कम हो गए
एक पगडंडी
जो मुझे लुभाती रही है
छोर पर खड़ा हो
निहारा करता हूँ उसे
मोड़, कई मोड़
पेड़ों की घनी छाँह
हरी दूब
चाहता हूँ दौड़ना
देखना चाहता हूँ
उसका अंतिम
बढ़ाए भी कदम
कुछ पदचिन्ह देख
फिर, रोक लिए
अब नहीं लुभाती 'वो"
उतरा हूँ अब
मैं भी बियाबान में
चुभते काँटों
झंखाड़ के बीच
'नई" लुभावनी राह बनाने
कई बातें होती है ऐसी
भूलकर भी कहाँ भूलता है कोई
साथ का भी है कुछ ऐसा
छूटकर कहाँ छूटता है कोई
चलती रहती है जिंदगी
मगर जम जाती है राहें कोई
निराशाओं के समंदर में भी
उम्मीद बँधा जाता है कोई
भटक जाओ तो
पदचिन्हों के सहारे ढूँढ लेता है कोई
भीड़ में भी जब तन्हा होता हूँ
निहारने लगता है चेहरा कोई
मरने तक का है साथ मेरा
फिर भले हजार तोहमतें लगाए कोई
क्यूँ होता है ऐसा
किसी एक मुस्कान पर
पिघल जाता है कोई
कुछ नहीं बचता उसका
सर्वत्र फैल जाता है कोई
सच-झूठ
तेरा-मेरा
राग-द्वेष
अपना-पराया
मोहब्बत-शोहरत
विश्वास-अविश्वास
ऐसे न जाने कितने
मंतर देखे
अपने हिसाब से
जपते तोते देखे
सही क्या है
पता नहीं
क्या 'सही" कभी
होता है सही
शायद, पता नहीं
हर जगह बिखरी है
बस 'दुनियादारी"
फिर कैसे, कब, कहाँ
कर पाएँगे बात 'हमारी"?
अदेह जब देह बन जाए
तो जहाँ तू बुलाए
मैं पहुँच जाता हूँ
जब सुन रही होती है संगीत
मैं ही तो गुनगुना रहा होता हूँ
तेरी जुबाँ का स्वाद
मुझे भी लगता है नमकीन
कपड़ों की तरह
तू पहन लिया करती है मुझे
रजाई समझ
दुबक जाती है मुझमें
रोज सुबह प्याला समझ
तेरे अधर छूते हैं मुझको
तेरे अंदर जो धड़कता है
वह दिल भी तो हूँ मैं
तू माने ना माने लेकिन
तेरी हर चीज में समाया हूँ मैं
तूझमें हूँ मैं, मुझमें है तू
कितनी अच्छी है ना यह अ-देह
हर आकार, प्रकार, स्वरूप
धर सकती है और
जी जाती है जन्म-जन्मांतर
मौत जब छूकर गुजरी
पल में मिल गया
पूरी जिंदगी का हिसाब
सेकंड में पूरी किताब
झर्र से खत्म हो गई
हर पन्नों पर 'अपने"
जैसे कह रहे हो
अभी हम जिए ही कहाँ?
बाद तक सोचता रहा
शायद ताउम्र करता रहूँगा मनन
अब बस जीऊँगा उनके लिए
जो उन पन्नों में दर्ज थे
क्या पता 'वह" छूने की बजाय
इस बार साथ ले जाए?
कई तूफानों से गुजरा
मगर साबूत ही रहा
बहुत यकीं था खुद पे
तभी एक झोंका
मेरा वजूद तक मिटा गया
कितने अच्छे थे
वे तूफानों के दिन
जब लड़ता था अपने लिए
अब खुद को मिटा कर
उसकी आँखों में
अक्स अपना ढूँढा करता हूँ
दोष उसका है, न मेरा
ये तो हवा ही कुछ है ऐसी
जो भी चपेट में आया इसकी
वह बहने से कहाँ रोक पाया है?
इस बेकराँ दिल को
कैसे चैन आए
तू ना होकर भी होती है
मैं होकर भी नहीं
मिलकर भी कहाँ मिल पाते हैं
बस शिकायतों में यूँ ही
रह जाया करते हैं रिते
जब थामा था हाथ
तब क्या पता था
इतनी बेरहम होगी जिंदगी
मिलने की तो दूर की बात
समय गुफ्तगू तक का ना होगा
कोशिश में हूँ
चलाऊँ कुछ ऐसा चक्कर
दिन बीते जुल्फों तले
रात गुजरे तेरी खुमारी में
तेरे प्यार का जश्न
ये बेचारा दिल भी मनाए