Saturday, March 24, 2012

जिंदगी के दो बेहतरिन साल!

मेरी प्यारी बेटी,
दो साल, चुटकियों में गुजरे। मेरी जिंदगी का अद्भुत समय। ऑपरेशन थियेटर के बाहर जब पहली बार तुझे गोद में उठाया था, तब तू आँखें फाड़कर मुझे देख रही थी। हमारी पहली मुलाकात... आँखें छलकी... सोना का शुक्रिया...!
पता है बेबी, तुझे में सपनों में देखा करता था। सोचा करता था। कैसी होगी तू, क्या कर रही होगी, माँ को जानती होगी, पर मुझे कैसे जान पाएगी...! लेकिन पहली ही बार में तूने मेरे सारे सवालों का जवाब दे दिए। बेहद खूबसूरत है तू, बिल्कुल मेरे सपनों में आती रही छोटी सी परी समान।
तब से लेकर अब तक मुझे यही लगा कि सपने देखना चाहिए। सपने ही तो हकीकत बनते हैं। ...तूने ही इस बात का यकिन दिलाया कि हाँ, सपने ही हकीकत बनते हैं। आमतौर पर बच्चे एक महीने में नजरें स्थिर करने लगते हैं, पर तू शुरू से ही मुझे देखती मिली। फिर चार महीने में तेरा इगो भी देखा। तेज आवाज शुरू से ही तुझे नापसंद रही है। किसी की नाराजगी का अहसास तूझे जब छ: महीने की थी, तबसे होने लगा। इस बात ने मुझे काफी चौंकाया। पहली करवट भी मेरे सामने ही तूने ली और वह इस तरह ली, जैसे करवट लेना तेरे लिए सामान्य बात हो। बड़ी आसानी से... फिर घुटने के बल चलना, सरपट दौड़ना और फिर धीरे-धीरे खड़े होना... सब ताउम्र के लिए तूने मेरे जहन में दर्ज करवा दिया।
कुछ महीनों की थी, जब तेरी माँसी और सोना ने कान छिदवा दिये। सफेद मोतियों के बीच एक लाल मोती... पता है बेबी... तू बहुत दहाड़े मारकर किसी भी वक्त रोने लगती थी। करीब सवा साल तक यह सिलसिला चला... और, रात को तो यह रोना जानलेवा ही लगता था। उस वक्त समझ नहीं आता था कि कैसे तुझे चुप करें... क्या-क्या नहीं करते थे... बोलना तो जानती नहीं थी तो लगता था हो सकता है पेट दुख रहा हो, दाँत आ रहे हो तो वहाँ दर्द हो, भूख तो नहीं लग रही... फिर तमाम तरह के प्रयोग... तेरा भोंगा चालू... नजरें भी उतारी जाती...! मैं कभी नजर लगने जैसी बातों को नहीं मानता, पर तेरे मामले में मानता हूँ... कई बार खुद से पूछा भी... जवाब भी मिला- कहीं सच में नजर लगती हो तो!
पहला शब्द तूने 'माँ" ही बोला था। बड़ा मजा आया, लेकिन तुझ पर गुस्सा भी। थोड़ी मुश्किलों से ही सही 'दाता" भी तो बोल सकती थी। अकेले में कई बार दोहराया भी कि दाता बोलने में तुझे कहा परेशानी आती होगी...
काश! दाता की जगह मुझे 'माँ" ही कहा जाता होता। खैर तूने धीरे-धीरे दाता बोलना भी सीख लिया... मैं कई बार तुझे कुछ सिखाना नहीं चाहता हूँ... सोचता हूँ तू अपने आप दुनिया को जाने... समझे और जिंदादिली से जिए!
तेरे पैर कमाल हैं। घुंघरूओं वाली पायल में तुझे ठुमक कर चलते देखना... फिर तेरा दौड़ना... कमाल लगता है। जब तू खड़ी होने लगी थी, तब कोई भी गाना सुनकर तेरा डोलता हुआ डांस... कैमरे को देखकर शुरू से ही पोज देना... कहाँ से सीखा तूने? लगता है तू जन्मजात ब्यूटी कांशस है। तभी तो बिना बालों वाली लड़की किसी के भी घने बाल देखकर सबसे पहले उन पर ही प्रतिक्रिया देती है और खुद का सिर छूने लगती है। यह तब की बात है जब तू बोलना नहीं जानती थी, जब बोलने लगी तो किसी बच्चे के लंबे बाल देखते ही खुद के सिर पर हाथ लगाते हुए बोलती-बालऽऽऽ
क्रीम, पाउडर, काजल, बिंदी, चूड़ियाँ, ढेंगलर, क्लिप, कंघा, डियो सबकी जन्मजात दीवानी लगती है। खिलौनों से पता नहीं क्या दुश्मनी है, वे बस आते-जाते ठोकरें मारने के लिए ही बने हैं। हाँ, लखन दादा का पहले जन्मदिन पर दिया डूबीसिंह तेरा फेवरेट है। इस एक साल में तू हमेशा ही उसे टांगे-टांगे घूमी, सोते समय भी उसे अपने साथ रखती है। ...और ब्रूनो पर भी थोड़ी मेहरबानी कर लेती है।
हर सवाल पर कोनफिडेंटली 'हाँ" कहना सोना से ही सीखा है। ये बड़ा मजेदार लगता है मुझे। एक बार तू अपने शूज ढूँढ रही थी। हमने कहा- सुन, जूते बालकनी में रखे हैं, ले आ। तूने बड़ी शान से हाँ कहा और कमरों में घुमकर आ गई। फिर कहा- बालकनी, फिर वहीं- हाँ और घूम-फिरकर वापस, फिर कहा- बालकनी, फिर वही- हाँ। हमें बड़ा मजा आया। आखिरकार मैं तूझे बालकनी में ले गया और बताया कि इसे बालकनी कहते हैं, तब भी वही सबकुछ जानने वाला 'हाँ", जैसे तुझे बालकनी पता थी।
एक बात और बहुत मजेदार लगती है तेरी! तुझसे पूछो कि कितने बजे हैं, जवाब- स्टाइल के साथ...पाँचऽऽऽ, कब जागी, पाँच... कितनी रोटी खाई, पाँच... हर सवाल में पाँच!
तेरी खम्माघणी करने की अदा पर जान लूटा देने का मन करता है। वो झुकना, प्यारे से हाथों को आपस में मिलाना... कितना सलोना है। हालाँकि कई बार तुझसे खम्माघणी करवाने को लेकर मैं विरोध भी झेल चुका हूँ कि बेटी को क्या बार-बार झुका रहे हो। अभी से उसे स्त्रीबोध क्यों करा रहे हो? पर, मैं तुझे जितना प्यार करता हूँ चाहता हूँ सब तुझे उतना ही चाहे... मेरी नजर में गरिमामय स्त्री थोड़ा सा झुककर दुनिया को कदमों में झुका सकती है।
तू बोलना सीखी तो मुझे भी 'मम्मा" ही बुलाती थी। यह अजीब लगेगा, लेकिन मुझे हल्का सा उस वक्त तेरी माँ सा अहसास होता था। अब कैसे, यह तो शायद मैं खुद न समझ पाऊँ!
एक बड़ी कार दुर्घटना भी मुझसे होते-होते बची। तब तू पीछे बैठी थी, लेकिन शायद तू समझ गई थी कि कुछ गड़बड़ है और चिल्लाई थी दाताऽऽऽ
स्टीयरिंग छोड़कर तुझे संभालू अचानक दिल ने यह कहा था। ...लेकिन उसी पल लगा कि मैं कार को पलटने से बचा सकता हूँ और हम बच गए। अब भी मुझे लगता है कि तेरे लिए बचा हूँ मैं!
बेबी, जब तुझे ये पत्र लिख रहा हूँ तो एक के बाद एक कितनी ही बातें और यादें तेजी से आ-जा रही है। उन भावनाओं को पेज पर उतारना नामुमकिन है।
तेरे किस...छुअन...मस्ती...खिलखिलाहट... नकली हँसी... नाराजी... मम्मा की दुमछल्ली बनना... नानी की गोद में जाकर हमें बाय कहकर टालना... अजीब सा फ्लाइंग किस... दादी का सिखाया गाना... ओए कहना... शादी करनी है मुझे... इस माँग के साथ मम्मा से फोन लगवाना... किससे? तो दाता से कहना...
ढेर सारा प्यार...

                                                                                                                      तेरे मम्मा-दाता