Tuesday, September 25, 2012

मेरे गाँव के पास लगता है हाट


आँख मलते हुए सूरज रात का कंबल फेंक जैसे ही पूरब से झांकने लगा, मेरे गांव का नजारा देख वह चिढ़कर बोला- क्या फिर बुधवार आ गया? उसका मेरे बचपन से लेकर या तबसे जबसे वह मेरे गांव को रोशन करता रहा हो, सवाल होता होगा- ये बुधवार को इस गांव के लोग मेरे जागने से पहले ही क्यों जागकर इतनी हड़बड़ी में रहते हैं? मुझे तो थोड़ा बड़ा होने  पर यह समझ आ गया कि मेरे गांव के पास वाले कस्बे जीरापुर में बुधवार को हाट होता है, लेकिन बेचारे सूरज को तो शायद ही अब तक पता चल पाया होगा कि हाट क्या बला है और इसके लिए तमाम गांवों में क्यूं हलचल मचने लगती है?
मैंने जबसे समझ विकसित की, गांवों में हाट के लिए लोगों में एक अद्भुत जुनून पाया है। ऐसा नहीं है कि पास के बड़े कस्बों में जाकर कभी भी खरीदी करने की सहूलियत ग्रामीणों के पास नहीं होती है। हर शहर में स्थायी दुकानें होती है। वस्तुओं के दाम भी लगभग वही... पर मैं सोचता हूं कुछ तो बात होगी हाटों में कि हाट वाले दिन ग्रामीणों का हुजूम उमड़ा चला आता है। वक्त के साथ हाट परंपरा मरी नहीं उल्टे ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित ही हुई है।
आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में सारे लोग हफ्ते भर की खरीदी और तफरिह करने के लिए इसी दिन का इंतजार करते हैं। यहां तक की हाट वाला दिन अनऑफिशियली उस क्षेत्र के अवकाश का दिन होता है। मजदूर वर्ग उम्मीद में होता है कि मालिक या ठेकेदार आज उसे निराश न करें और हाट में खरीदारी के लिए कुछ पैसा दे दे। इधर बस, टेम्पो, ट्रेक्टर आदि वाहन मालिक भी सुबह से ही सवारियां ढोने की पूरी तैयारियों में होते हैं। मंगलवार रात से ही जीरापुर में चहल-पहल शुरू हो जाया करती है। आसपास के सैकड़ों गांवों से मवेशी खरीदी-बिक्री के लिए पहुंच जाते हैं। उधर कपड़े, बर्तन, जूते-चप्पल, खिलौने, चाय, मिठाई, सब्जियों, सौंदर्य प्रसाधन, गोदने वाले अपने-अपने स्थान पर आ जमते हैं। छोटी-छोटी दरियों, चटाइयों और टेंट के नीचे दुनिया-जहान की सामग्री सज जाती है।
सालों से देखता आ रहा हूं पसीने से सने चेहरे और एक-दूसरे को धकियाते लोगों को हाट में खरीदी करते और गपियाते हुए। ...पहले मुझे लगता था-क्या बेवकूफी है। वही सामान, वही किमत फिर ऐसी मारामारी क्यूं? क्या मिलता है इन लोगों को हर हफ्ते यह बेवकूफी करने में? ...पर जब मैं भी घर का सामान खरीदने लायक समझ वाला हुआ, इस बेवकूफी में शरीक हो गया। ...क्योंकि यहां मुझे सामाजिकता, हास्य, सामंजस्य, प्रचार, मनोरंजन जैसे कितने ही रस कुछ घंटों में ही मिल जाते हैं, तो फिर कोई इतने मजे छोड़कर बोरिंग सी खरीदारी क्यों हाट के इतर दिनों में करेगा?