Wednesday, January 4, 2012

अ-देह!

अदेह जब देह बन जाए
तो जहाँ तू बुलाए
मैं पहुँच जाता हूँ
जब सुन रही होती है संगीत
मैं ही तो गुनगुना रहा होता हूँ
तेरी जुबाँ का स्वाद
मुझे भी लगता है नमकीन
कपड़ों की तरह
तू पहन लिया करती है मुझे
रजाई समझ
दुबक जाती है मुझमें
रोज सुबह प्याला समझ
तेरे अधर छूते हैं मुझको
तेरे अंदर जो धड़कता है
वह दिल भी तो हूँ मैं
तू माने ना माने लेकिन
तेरी हर चीज में समाया हूँ मैं
तूझमें हूँ मैं, मुझमें है तू
कितनी अच्छी है ना यह अ-देह
हर आकार, प्रकार, स्वरूप
धर सकती है और
जी जाती है जन्म-जन्मांतर