Thursday, June 28, 2012

तेरा असर...

ये तेरा असर है कि
दर्द भी अब भाता है मुझे
भटकता हूँ सहरा में मगर
चश्मों की नहीं ख्वाहिश मुझे
मर जाने दो यूँ ही प्यासा
दो बूँद जो पानी दे
अब तो वह फरिश्ता भी
लगे है दुश्मन मुझे
डूबा हूँ यूँ समंदर में तेरे
किनारों की अब कहाँ चाह मुझे
कभी होता था मुट्ठी में जहाँ
अब तो ये दुनिया लगे पराई मुझे
डराता था जो बियाबान कभी
चप्पा-चप्पा लगे है अब वाकिफ मुझे
जख्मों की है बस इतनी-सी रजा
मरहम के लिए ही सही
तू बस छू दे मुझे
देखना एक दिन ऐसा भी होगा
दर्द के सहरा में होगी कश्ती मेरी
और तू दे रही होगी आवाज मुझे
फिर से बात होगी तेरी-मेरी
आँखों में मेरी आँखें डाल
तू कहेगी
फिर कभी छोड़कर न जाना मुझे