Thursday, June 15, 2017

वो चाहती हैं



वो चाहती हैं
खुशियों का झरना
सदा बहता रहे दामन से।
हर बच्चा
चैन से सुस्ता ले
उनकी बरगद सी छांह में।
मक्खन से हाथों का स्पर्श
छीन ले सारे रंजो-गम
चहेतों के जीवन से।
गोद में जो आए कोई
भूल जाए फिर
हर दर्द जो छिपा हो दिल में।

वो चाहती हैं
उनकी पनीली आँखों में
कोई झांक कर खंगाल ले
वो सारे रहस्य
कैसे स्पष्ट हार पर भी
धैर्य ओढ़ा जाता है।
कैसे बुरे वक्त को
उम्मीद की एक किरण के सहारे टाला जाता है।
कैसे बड़े गुनाह पर भी
माफी का इनाम दिया जाता है।
कैसे गिरने पर भी
हौंसलों से सहारा दिया जाता है।
कैसे बच्चों की फरमाइश को
खुद की इच्छा का नाम दिया जाता है।
कैसे दिल में उमड़े सैलाब को
आंखों तक भी न आने दिया जाता है।
कैसे हंसी-हंसी में
जिंदगी का रहस्य समझाया जाता है।
कैसे अपने फैसलों पर
पहाड़ समान अडिग हुआ जाता है।
कैसे बहुओं और बेटियों को
फैसलों का अधिकार दिया जाता है।
वो चाहती हैं
लेकिन, कहती कुछ नहीं।
कभी नहीं कहा कुछ
सब समझा गया।
जिसने जो समझा
अपने-अपने तई मान लिया।
पूरी तरह कभी कुछ नहीं समझा गया
वैसा, जैसा वो चाहती हैं।
शायद पूरी तरह कभी
समझा भी ना जा सके
भला ईश्वर को कोई
पूरी तरह समझ सका है।


Monday, September 26, 2016

शब्द बेजुबान



हवा में तैरती शब्दों की नदी
पता नहीं कौन से समुद्र में
हो जाया करती है विलीन
कौन सुनता है
क्या कभी किसी को
सुना भी गया है
या कह देने भर का मसला है
हर बात सुनी गई
फिर भी अनसुनी ही रह गई
हर तरफ बस शोर है
फिर भी शब्द बेजुबान
काश कि मौन मुखर हो
सुन सके वे सारी बातें
जो बयां होकर नहीं सुन पाया कोई

Friday, September 16, 2016

शून्य


रिश्ते को जीने से
उसके जीने की आदत हो जाती है
जीते-जीते ही उसमें
रिसने की आदत हो जाती है
बूंद-बूंद कर
एक खालीपन की आदत हो जाती है
इस रिक्तता में ही कहीं
खोने की आदत हो जाती है
फिर इस शून्य में ही कहीं
मैं और वह समा जाते हैं
रिश्ते को जी लेने से
बचता कुछ नहीं है
ना मैं होता हूं
ना वह
लेकिन, ना जीया जाये तब
मैं तो होता हूं
साथ होती है
मरघट सी विरानी

Friday, March 25, 2016

बर्थ डे प्रोमिस


वो कहती है- दाता मेरा रिजल्ट आने वाला है। मैंने कहा- अच्छा... तो डर लग रहा है।
तो जवाब आता है- डर क्यों?
मैं- तो कम मार्क्स आने का डर नहीं है।
वो- नहीं, मुझे सब आता है। नानी कहती है... मुझमें बुद्धि है।
मैं- अच्छा, यदि कम मार्क्स आए तो मैं पप्पियां देना बंद कर दूंगा।
वो- नहीं।
मैं- क्यों?
वो- दाता... रिजल्ट का पप्पियों से क्या संबंध?
कुछ दिन बाद वो धीरे से मेरे सीने पर लेटती है, कहती है- दाता, पप्पियां देना बंद मत करना, प्लीज।
मैं भरी आंखों से उसे सहलाता हूं, पर बैचेन हूं बहुत। उसे मेरा कहा इतना याद है। क्या इतना सिरियसली लेती है वो मुझे? क्या उस दिन का मेरा कहा अब तक उसमें कहीं घुम रहा था, परेशान कर रहा था?
फिर रिजल्ट आने वाले दिन वह सुबह 6 बजे ही उठ जाती है। जल्दी है उसे नतीजे से ज्यादा इसकी कि वह फर्स्ट में जाने वाली है। मुझे जल्दी जगा देती है कि उठो रिजल्ट आने वाला है। आपको और मम्मा को चलना है स्कूल। फिर धीरे से धमकी- पप्पियां देना ही है, उसका रिजल्ट से कोई संबंध नहीं है।
मैं हां कहता हूं, तभी फरमाइश आ जाती है कि नानी ने कहा था कि रिजल्ट आएगा तो पिजा खिलाएंगें। मैं फिर आदतन बोलता हूं कि अच्छा रिजल्ट रहा तो पिजा। उसका गुस्से से फिर एक जवाब- दाता, रिजल्ट का पिजा से कोई संबंध नहीं है। मैं हंसता हूं और कहता हूं अच्छा क्यों नहीं है संबंध। तो जवाब मिलता है- दाता, पिजा खाने की चीज है, जैसे खाना खाते हैं वैसे ही। अब रिजल्ट आएगा या नहीं आएगा तो क्या मैं कुछ खाऊंगी नहीं?
मैं खोया-खोया उसके स्कूल पहुंचता हूं। सारे रास्ते ये सोचता हुआ कि कितना कुछ है जो यह जरा सी जान मुझे सीखा रही है। आखिर ऐसी उम्मीदें क्यों? उम्मीदों का बोझ ही क्यों? शर्तें ही क्यों? शर्तें पूरी करने का दबाव क्यों? स्पर्धा क्यों? सफलता-असफलता के पैमाने क्यों?
ऐसी ऊहापोह में रिजल्ट हाथ में आता है और वो मेरी आंखों में झांक कर कहती है- देखा दाता... रिजल्ट अच्छा आया ना... वो तो आना ही था। अब तो पप्पियां दोगे ना और चलो पिजा खाने।
लव यू युगी...ना कभी पप्पियां बंद होगी ना कभी पिजा के लिए किसी रिजल्ट का इंतजार होगा। प्रोमिस कि तुझे कभी कोई परीक्षा से नहीं गुजरने दूंगा।

Saturday, July 25, 2015

समझदारी


छोड़ने की बात वो कहते रहे
हम पकड़ने पर जोर देते रहे
हम निरे बेवकूफ थे
बेवकूफ ही रहे
वो समझदारी से
ये बात समझते रहे
वो चलाते रहे
हम चलते रहे
कब समझेगें हम
पता नहीं
वो दिल को हमारे
खिलौना समझ खेलते रहे
हम देखते रहे
यूं ही धीरे-धीरे टूटते रहे
ऐसे ही एक दिन
हम कबाड़ में फेंके जाते रहे
हम निरे बेवकूफ थे
बेवकूफ ही रहे
हां, सच तो यह भी है
छोड़कर हमें
उनसे हम छूटे नहीं
अपनी ही समझदारी पर
कईं बार वो रोते रहे
हम निरे बेवकूफ थे
बेवकूफ ही रहे
 

Friday, July 17, 2015

ख्वाहिश


अरसे से नहीं मिला मैं
नहीं की बातें खुद से
धूल की मोटी परत
आ जमी है भीतर तक
हर ओर बिखरे पड़े हैं शब्द
बेतरतीब, बेख्याल
सोचता हूं समेटूं, सहेजूं
शब्दों को फिर अर्थ दूं
धूल के पीछे छूपी
संवेदनाओं को जरा शक्ल दूं
बहुत हुआ, कसम से
आ जरा अब पास मेरे
घड़ी भर तू भी सांस ले
दो घूंट जिंदगी के
फिर संग पी मेरे
मेरी संवेदनाओं, शब्दों को
फिर से पिरोकर बातों का नाम दे
मुझ से फिर मिला दे मुझे
इसे फिर मोहब्बत तक अंजाम दे

Tuesday, May 12, 2015

हद


हर वक्त मैं
हद में रहा
जिंदगी यूं ही पास से
मुस्कुरा के गुजर गई
चाहता था उसे छूना
जी भर जीना
नहीं मिली खुद से
इजाजत मुझे
डर था, कोई समझेगा काफिर
तो कोई कहेगा मौकापरस्त मुझे
डर ये भी था कि
छूने से कहीं
मैला ना हो जाए दामन मेरा
तोहमतों के बाजार में कहीं
कोई ले ना ले नाम मेरा
फिर, मैंने बस इतना किया
मैं हद में रहा
और जिंदगी
यूं ही मुस्कुरा के गुजर गई