Tuesday, April 24, 2012

शाम 'तू"

धीरे-धीरे आसमान से उतर
कहीं खो जाने को बेताब
ये अस्ताचल सूरज
झुंड के झुंड पंछी भी
कहीं पेड़ों में हो रहे गुम
दिन भर की गर्मी 
न जाने कैसे हवाओं में घुल
ठंडी पुरवाई का रूप ले चुकी
दूर कहीं डूबती-सी
देवालयों से आती घंटियों की आवाज
उस पर सारी प्रकृति को पेंसिल से
हल्के-हल्के धूसर करने का षड्यंत्र
रोज पूरी कायनात में
गौधूली होते ही घुल जाती है शराब
और, नशे में डूबा मैं
पाता हूँ खुद को तेरे आगोश में
फिर न जाने कैसे
सब स्याह हो जाता है
न 'तू" तू होती है
न ही 'मैं" मैं
कमबख्त, इसलिए ही
हर शाम तेरी तरह
और, तू शाम की तरह
लगती है रूमानी