सूरज जब-जब खिलता है मेरे दिल में भी खिल आती है एक उम्मीद घास पर उग आए मोतियों की तरह फूलों की महक पंछियों की चहक की तरह सर्द हवा में गुनगुनी धूप नदी के कुनकुने पानी की तरह तपती रातों के बाद सुबह की रूमानी हवा की तरह मां के आंचल में छुप दूध पीते बच्चे की तरह किसी अखबार में खुशनुमा खबर की तरह किसी मजदूर के रोजगार की तरह रोज उम्मीद बस जागती है कुछ इसी तरह और, ये कुछ नहीं बस तेरी एक मुस्कान है यही तो.... मेरी रोज की मजूरी बस तेरी मुस्कान है
तेरे मेरे दरमियां है जो बात वो अब खुल जाने दे जान जाने दे भेद सारे यकिं है कोई न आएगा जब बात होगी जख्मे मरहम की ना तेरे दर्द की दवा कोई होगा ना करेगा कोई बात मेरे जख्म की फिर क्यों रहें हम पर्दानशीं ये बात गर खुल भी जाए तो क्या वहां गहरे हैं दर्द तमाम लोग तो करते हैं बस सौदे दिलों के दर्द की बात ही तो है फखत हमारे हिस्से तो ए मेरी जान वो बात अब खुल ही जाने दे
तुम होती हो तो भर देती हो उस रिक्तता को जो तुम्हारे न होने पर आ घेरती है मुझे तुम न होती हो तो भर आती है वह रिक्तता जो तुम्हारे होने से भरी होती है मुझे तुम्हारे होने, न होने के बीच ही झुलती है रिक्तता और मैं? मैं इस रिक्तता में ही कहीं करता रहता हूं इंतजार तुम आओ छा जाओ मुझ पर ताकि मेरा हर कोना भर जाए, महक जाए
काश, न प्यास हो न कोई आस हो कुछ न हो अनंत तक बस एक खामोशी हो जो कह सके मेरे सारे ज़ज्बात एक पुल हो जो मिटा दे सारे फासले और, फिर 'वह" भी न हो तब न चाह बचे, न हौंसला न दिल, न दिमाग खोमोशी ओढ़े यह जिस्म धीरे-धीरे खो जाए 'मैं" से अनंत में
तुझे जीने के लिए जरूरी नहीं है तेरा होना पर, तेरे होने के लिए अब मेरा होना है जरूरी मैं ना रहा तो तू बता पहचान ही क्या है अब तेरी कभी जोड़ा करते थे कुछ दिलजले तेरे नाम के साथ नाम मेरा पर अब, लेते हैं वे ही सातों पहर कसमें मेरे प्यार की तू घड़ी भर ठहर देख तो सही कैसे ना होकर भी किसी में जी रहा होता है कोई कैसे सहरा में जीवन की आस में भटकता है कोई और कैसे डूबकर भी जीने की तमन्ना रखता है कोई कैसे छूटकर भी खुद को जोड़े रखता है कोई कैसे दर्द के सैलाब में उम्मीदों के तिनके बीनता है कोई कैसे तेरे होने, ना होने में खुद को उम्मीदों में बांधे रखता है कोई
तड़प के लिए जरूरी नहीं उम्र गुजारी जाए एक आह ही काफी मौत के लिए यकीन ना हो तो देख आजमां के खुद को ताउम्र की बातों को दो बोल से तौल आजमाना जरूरी है नहीं तो, उम्र निकल जाती है गलतफहमियों में कभी तू डूबना चाहे तो जरूरी नहीं समंदर ले आगोश में तुझे एक कतरा ही काफी है मौत को गले लगाने के लिए गर तू जीना भी चाहे तो काफी है खुशियां दो पल की उन खुशफहमियों से जो मिलती है तुझे चालाकियों से मैं पाना चाहता हूं तुझे दो पल के लिए वो भारी है तेरे उन पल पर जो कमाए है तुने जिंदगी भर के लिए
मुझमें तेरे होने की बस यही है निशानी दर्द है भीतर कहीं भरी है बेचैनी बाहर हर कहीं हर वक्त है एक खोज जानता हूं नहीं है तू कहीं हर चीज है सूनी जैसे छूट गई है जिंदगी कहीं सन्नाटे को चीरता सन्नाटा कहता है, फिर से देख वो होगी यहीं कहीं क्या करूं मुझमें तेरे होने की बस यही है निशानी
कभी लगता है मैं भी अतीत हो जाऊं देखा है मैंने अधिकांश को इसे गले लगाते फिर सोचता हूं क्या होगा उन 'चंद" का जो चिपकाये हुए है वर्तमान में सीने से मुझे और, इनके ही दम पर मुझे गुमान है अपने जिंदा होने पर
जब तू लौट आएगी बातें होंगी जी भर लौटना जरूर पर, सोचता हूं छोड़ पाएगी उस स्व को जो रात-दिन तुझमें ही ले रहा होता है सांसें उस जमीन, घर, दफ्तर को जो लील जाते हैं तुझे रोज उस भीड़ को जिसमें कहीं गुम होते देखा है मैंने उस ऊहापोह को जो घटित होती है प्रति क्षण तुझमें उस मन को जो हर वक्त है बेचैन उस विरानी को जिसे खुशियों के उत्सवों को भी लीलते हुए देखा है मैंने उस जिस्म को जो बस प्यास ही तो जगाता है जानता हूं इतना सबकुछ छोड़कर लौटने में वक्त तो लगता है इसलिए, इस बार लंबा इंतजार फिर ना जाने के लिए खालिस तू जब होगी तभी तो, बातें होंगी जी भर
हर वक्त पकड़ता हूं वक्त को इधर, छूटी जाती है जिंदगी हाथ से सबकुछ साधने की हवस में हो रही है खाक हस्ती मेरी ऐ-वक्त आखिर कब देगा चुटकी भर वक्त मुझे ताकि घड़ी भर देख सकूं थोड़ा मरहम लगा सकूं तूने दिए हैं जो घाव मुझे क्यूं नहीं तू रुक जाता दो पल को मेरे साथ बातें करता जिंदगी का तू भी इंतजार करता फिर बाहों में जकड़ उसे हमकदम मेरा होता
एक रोज के लिए लेना चाहता हूं उधार तुझे, तुझी से फिर जी भर खर्च करूंगा इस कदर तुझे, तुझी पर कि, भूल जाएगी खुद के जीने का अंदाज बस याद रहेगी तुझे हमेशा मुझ पर चढ़ी उधारी और, खुद से खुद की ये खरीदारी
बुझ रहा है थम रहा है मंद-मंद ठंडा हो रहा है जल रहा है बह रहा है मंद-मंद खाक हो रहा है काश, कुछ हो ऐसा वो बचा रहे कांच के बर्तन में भी हर प्रहार सहता रहे यदि चटके भी तो ऐसा कण-कण में बिखरकर ये दिल, वैसा ही दिल रहे
अरसे से मौन है शब्द मौन है जिस्म हवा भी है मौन मौन है वृक्ष भी ये जल, पर्वत, पक्षी रास्ता, घर, बाजार और हर शख्स है मौन हर खोज भी दुनिया जहां की मौज भी बस मौन, हर ओर मौन काश कोई समझे मन की भाषा ताकि, हर मौन फिर बोल पड़े
ख्वाब कईं बसाए आंखों में दबाए बेटियां कांख में वह चलती रही थकी भी होंगी हुए होंगे कदम विचलित भी यकीनन, कईं कोशिशें हुई रोकने की उसे पर न वो रुकी न कभी डगी बढ़ती रही हकीकत होते रहे उन जागती आंखों के ख्वाब उसी ने बनाया गुड़िया को खालिस सोना और, सोना देखते ही देखते गीतांजली बना नजर आया ख्वाब तो अब भी पल रहे हैं उन आंखों में बस इंतजार है फिर एक कोपल के 'युगंधर" बनने का
रूह को छू जाए कुछ ऐसी बात कर आ घड़ी भर रूक फिर ना जाने की बात कर तोड़ दे हर बांध आ अब बहने की बात कर बहुत हो गया दूर-दूर अब पास आने की बात कर पत्थर की तरह कठोर क्यों पिघलने की बात कर तेरे बिन अंधेरी है जिंदगी बस अब रोशनी की बात कर आ गये हैं मझधार में अब डूबने की ही बात कर हर बार जीत ही जाती है इस बार कुछ हारने की बात कर चल दिए हैं सहरा में तो पानी की नहीं, प्यास की बात कर बहुत हुई खुशियों की खोज अब कुछ खो देने की बात कर तुझ में मैं, मुझमें तू कुछ ऐसे ही, एक होने की बात कर क्यों दो दुनी चार, चार दुनी आठ कभी तो शून्य की बात कर जिंदा रहने के भ्रम के लिए ही सही कुछ देर तो मौत की भी बात कर हर वक्त का चलना ही क्यों कुछ देर एक-दूजे को देखने की बात कर मुट्ठी भर जो वक्त है इसमें पूरी उम्र जीने की बात कर रूह को छू जाए कुछ ऐसी बात कर कुछ ऐसी बात कर...
कभी खुद का जिस्म भी चुभता है मुझे कभी चाहता है खुद को अपने हाल पर छोड़ देना कभी लाद देना चाहता है जंजीरें हजारों तो कभी डूब जाना चाहता है शून्य में कभी इस तरह घुल जाना चाहता है सूर्य में कि हर कतरे से रोशनी फूट पड़े कभी अंधेरे, घोर अंधेरे में चाहता है गुम हो जाना कभी बियाबान में भटक कर जार-जार चाहता है हो जाना कभी किसी दरिया में मर जाना चाहता है प्यासा कभी किसी सहरा में देखना चाहता है अपनी मौत ये दिल जो है ना कमबख्त हर दर्द चाहता है झेल जाना पर नहीं चाहता है कभी नहीं चाहता है खुद पर एक खरोंच तक आना
जब भी चुनी है कोई राह चौराहे पर उलझा हूं जब भी आया है कोई ख्याल न जाने कैसे चले आते हैं साथ उसके अनगिनत विचार जब भी छिडी़ है भावना की एक तरंग न जाने कहां से उठ आता है ज्वार हार-जीत के बिच घमासान आशा-निराशा के बिच का द्वंद समाज-वैयक्तिक के बिच की खिंचतान किस कदर खुद को निचोड़ लेता हूं मैं एक कतरा भी नहीं होता पास मेरे किसी पेंडूलम की भांति झुलते हर वक्त खुद को देखना साधते रहने की ताउम्र की साधना क्या बस इतनी-सी है जिंदगी? या नदी, पहाड़, झरने, जंगल चहचहाहट, मुस्कुराहट इंसानियत, मुहब्बत सबको जी भर एक सांस में भर लेने को ही कहा जाता है जिंदगी? पता नहीं फिलहाल, सिक्के के दो पहलूओं के बिच Iखड़ीO हुई है मेरी जिंदगी
हाथ में लाल गुलाब घुटनों के बल या कुछ यूं करूं ले आऊं तुझे एक लांग ड्राइव पर चटक चांदनी में कह दूं अपनी बात या कुछ यूं करूं नाव में हो सवार मझधार में हो जाऊं थोड़ा रूमानी या फिर किसी झील के किनारे नजरों के रास्ते तुझे करा दू्ं दिल की सैर या कुछ यूं करूं तितलियों के देश में फूलों के बिच थाम कर तेरा हाथ दिखा दूं अपने ज़ज्बात हर वो बात करूं जो छूती हो दिल को तेरे और, लाती हो करीब और करीब तेरे क्या इतना भर काफी नहीं हर बार की तरह फिर एक बार कह दूं तुझे हां, प्यार है तुझसे और, ताउम्र करता रहूंगा यूं ही प्यार तुझे
एक जान कैसे होते हैं नहीं पता ये भी नहीं पता कब देखा था तुझे जी भर क्या कभी थामा था अपने हाथों में तेरा हाथ सीने से तुझे लगाकर धड़कने कभी क्या गिनी थी मैंने दूर तक, बहुत दूर तक यूं ही मौन कभी घूमते थे हम? तेरी महक कभी उठती थी मेरे जिस्म से? हंसी तेरी आवाज, वो घंटों बात कभी की थी हमने? नहीं पता ये भी नहीं पता क्या कभी जीया जाता है ऐसे शायद सब कुछ, हां सब कुछ स्वप्न था ना होता तो क्या कभी तू नहीं दिला देती याद
जब निराश होता हूं चाहता हूं थामे हाथ कोई बातें करें मुझसे मेरी देखे अंदर झांककर अंधेरे में चिंगारी सुलगाये बालों को सुलझाती ऊंगलियां दिल की गुत्थियां सुलझाये मौन की भाषा से ढेरों बातें करता जाए भीतर उठे लपटें तो प्यार की बारिश कर जाए हताशा के काले बादलों में मेरा साया बन जाए अकेले में भी साथ की उम्मीद जगा जाए लेकिन, जब निराश होता हूं साथ होती है बस निराशा मेरी चाहत, कईं-कईं बार मेरे ही हाथों डूबी है मेरी ही निराशा में और मैं अभिशप्त हूं ऐसे ही उसे डूबकर हर बार मरते देखने के लिए