Saturday, February 15, 2014

खडा़ सिक्का... ये जिंदगी....



जब भी चुनी है कोई राह
चौराहे पर उलझा हूं
जब भी आया है कोई ख्याल
न जाने कैसे चले आते हैं
साथ उसके अनगिनत विचार
जब भी छिडी़ है भावना की एक तरंग
न जाने कहां से उठ आता है ज्वार
हार-जीत के बिच घमासान
आशा-निराशा के बिच का द्वंद
समाज-वैयक्तिक के बिच की खिंचतान
किस कदर खुद को निचोड़ लेता हूं मैं
एक कतरा भी नहीं होता पास मेरे
किसी पेंडूलम की भांति झुलते
हर वक्त खुद को देखना
साधते रहने की ताउम्र की साधना
क्या बस इतनी-सी है जिंदगी?
या नदी, पहाड़, झरने, जंगल
चहचहाहट, मुस्कुराहट
इंसानियत, मुहब्बत
सबको जी भर
एक सांस में भर लेने को ही
कहा जाता है जिंदगी?
पता नहीं
फिलहाल, सिक्के के दो पहलूओं के बिच

Iखड़ीO हुई है मेरी जिंदगी