Sunday, July 17, 2011

फिर भी...



हर बार बुन लेता हूँ
सुनहरे से ख्वाब
जानता हूँ नहीं होंगे पूरे
फिर भी...
सुन लेता हूँ
तेरे कदमों की आहट
तुम नहीं हो
फिर भी...
गुनगुना लेता हूँ
प्रेमगीत
अकेला हूँ
फिर भी...
देख आता हूँ
वे गलियाँ, बगीचे
तुम नहीं मिलोगी
फिर भी...
पलट लेता हूँ
किताबों के पन्नो
नजर आएगा सूखा गुलाब
फिर भी...
तुम नहीं जानती
चाय की प्याली
रेस्टोरेंट की कुर्सी
कार का मिरर
घर की चाहरदिवारी
बिस्तर की सिलवटें
वो आईना, वो सोफा
कम्प्यूटर का की बोर्ड
वो, वो हर चीज
जो जुड़ी रही है तुमसे
करती है हर पल इंतजार
जानती है तुम नहीं आओगी
फिर भी...