Saturday, July 2, 2011

इस बारिश...



सोचा था इस बारिश
इस कदर बरसोगे तुम
कभी रोपा था जो बीज
उसे अंकुरित कर दोगे तुम
बरसों-बरस का सूखा
इक पल में हर लोगे तुम
दिख रही हैं जो दरारें
सोता बन झरोगे तुम
बेजान हो चुके ठूँठ को
कोपलों से भर दोगे तुम
पथरीली इस नद में
उफान ला दोगे तुम
रोज... रोज...
घनघोर घटा बन छाते हो
फिर निराश, हताश छोड़
किसी और राह चले जाते हो
हर पल... हर क्षण...
चातक सम ताकता हूँ