Saturday, July 16, 2011

कुछ नहीं बदला... सब बदल गया!



सुबह से जोरदार बारिश का दौर चल रहा है। नौ बजने को है, मगर अब तक सुबह अलसाई हुई ही लग रही है। शिरिष भी अलसाते हुए बिस्तर छोड़ता है और खिड़की खोल देता है।
बाहर एक महिला अपने बच्चे को लगभग ध्ाकियाते हुए तेजी से ले जा रही है। शायद बच्चे को स्कूल पहुँचाना है। इक्का-दुक्का वाहन भी सड़क पर बहते पानी को चिरते हुए तेजी से गुजर गए।
शिरिष का फ्लैट तीसरी मंजिल पर है। जब वह यह फ्लैट खरीदने पहुँचा था तो पहली ही बार में लोकेशन उसे भा गई थी। फ्लैट के बाहर देखते ही चौड़ी रोड और उससे आजू-बाजू घने पेड़ (शायद शहर के इसी हिस्से में नगर निगम की मेहरबानी से बच गए थे) नजर आते हैं। शिरिष का खाली वक्त या तो गैलरी में बितता है या कमरे की खिड़की से बाहर झाँकते हुए। उसने तीसरी मंजिल पर घर इसलिए भी खरीदा कि ऊँचाई से उसे सारा नजारा स्पष्ट नजर आए। जिंदगी को लेकर भी उसका नजरिया कुछ इस तरह का रहा है। ऊँचे से देखो तो हर चीज स्पष्ट और सटीक नजर आएगी। फिर गलतियों की गुंजाइश भी नहीं रह जाती।
उसके मम्मी-पापा बड़े भाई और भाभी के साथ गाँव में रहते हैं। वैसे भी शिरिष की फिलोसॉफी उन्हे नहीं भाती। कितनी ही बार उन्होंने उसकी शादी की कोशिश की पर अब तो वे भी बोल-बोल कर हार गए। 35 पार शिरिष से अब वे शादी की उम्मीद भी छोड़ चुके हैं।
तो शिरिष अब तीसरी मंजिल से बारिश का नजारा देख रहा है और पता नहीं ये बारिश का असर है या कोई सपना देख कर उठा है सो थोड़ा नॉस्टैल्जिक हो गया है। बैचेन है और इसी बैचेनी में तो वह पीना सीखा है। पहले जब सारे दोस्त मौज-मजा किया करते थे तो वह पास ही बैठकर सॉफ्टड्रिंक लेता था। तब सारे फ्रेंड्स उसकी हँसी उड़ाया करते थे। पता नहीं इन दो-चार सालों में वह क्यों पीने लगा?
बरबस ही उसने रम का एक बड़ा सा पैग बनाया। नीट ही छोटा सा सीप लेकर लगभग झाँकते हुए ऊपर देखने लगा, मानो वह बारिश का सोर्स पता कर रहा हो। सीप लेते ही मुँह एकदम कड़वा सा हुआ और फिर ध्ाीरे-ध्ाीरे वह रम को मुँह में घुमाने लगा। फिर उसे लगा यह कसैलापन अब उसकी जिंदगी का हिस्सा होता जा रहा है। फिर ध्ाीरे से वह उठा और गैलरी में लगी कुर्सी पर जा बैठा।
बारिश की बूँदें उसके शरीर पर छुई या रम का कसैला घूँट पेट में पहुँचा उसके शरीर में अजीब सी सिहरन दौड़ गई। उसे लगा कि जैसे किसी ने उसके गले पर गर्म साँस छोड़ दी हो। वह जानता है वह अंजली थी, जो उसकी साँसों और जिस्म में रची-बसी है। ...पर यहाँ तो वह अकेला है, फिर क्यों रह-रह कर उसकी याद अक्सर उसके बिस्तर, तकिये, चाय के प्याले, टीवी के रिमोट, किताबों, कम्प्यूटर, शर्ट, रुमाल, पेन सभी में आ बसती है? उसने रम की एक और बड़ी सीप मारी। मुँह को और कसैला कर आँखें भींचते हुए रम को पेट में ध्ाकेल दिया। वह कुर्सी छोड़ना चाहता था, किंतु वह और गहरे जा ध्ाँसा। सड़क पर इक्का-दुक्का लोग आ-जा रहे हैं, लेकिन उसे लगा वह वर्षों से वहीं बैठा है।
बारिश में वह तरबतर हो चुका है, लेकिन कहीं अंदर वह बिल्कुल सूखा है। वह मन ही मन बड़बड़ाता है-क्यों? अंजली क्यों किया? या शायद मैंने ही...!
छोटी-सी तो बात थी, पर क्या उसका डर और सामान्य सी बातों पर नकारात्मक प्रतिक्रिया छोटी बात थी। हर बार वह कहता- तुम्हारे परिवार से मैं बात कर लूँगा। तुम चिंता ना करों। क्यों डरती हो इतना? क्या मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं है? अक्सर उसे समझाने में घंटों बित जाया करते थे। वह समझ जाती और कुछ समय बाद फिर उलझ जाती। वह कहती- मेरे अंदर यह इनबिल्ट है। तुम्हे जो बातें मामूली लगती है, वे जरूरी नहीं कि मुझे भी मामूली लगे। तुम नहीं संभाल सकते मुझे!
शिरिष खुद से ही कहता है- क्या गलती थी, मेरी? उस दिन भी तो मैं हमेशा की तरह उसे ऑफिस से घर के कोने तक छोड़ने गया था। रास्ते में यूँ ही गपिया रहे थे, एक आदमी ने आकर पूछ लिया क्या कर रहे हो। तुम्हारे घर का पता बताओ, मैं पुलिस से हूँ। जैसे-तैसे उस आदमी को समझाया। मैं जानता था, उसे तो समझा लूँगा पर क्या अंजली को समझा पाऊँगा। उस व्यक्ति के जाने के बाद तो जैसे वह बिखर गई। बोली- देखना किसी दिन तुम मरवाओगे मुझे। भाई को पता चल गया कि मैं नौकरी के बाद यहाँ तुम्हारे साथ हूँ, तो पक्का है कि मेरी नौकरी तो जाएगी ही तुम्हारी भी जमकर ध्ाुनाई होगी। मुझमें हिम्मत नहीं है कि मैं उन लोगों के सामने तुमसे शादी करने का दावा कर सकुँ।
एक दिन ऑफिस के उसके एक कलीग ने मेरे साथ उसे देख लिया। फिर क्या था अंजली मुझसे कन्नाी काटने लगी। उसकी सख्त मनाही थी कि मैं उसके ऑफीस के आसपास भी ना फटकूँ।
शिरिष ने फिर रम का बड़ा सीप लेकर आँखे मूँद ली। ऐसा नहीं है कि अंजली डर-डर कर ही उसके साथ जीती रही है। ये फ्लैट जब खरीदा था और सरप्राइज देने के लिए वह उसे यहाँ लाया, तो वह किसी पागल बदली की तरह उस पर इस कदर बरसी थी कि आज भी उसकी साँसों की गरमी जिस्म में दहकती रहती है। कैसे वे लम्हों की चोरी कर इसी गैलरी में चाय के घूँट लिया करते थे। कैसे उसकी गहरी आँखें बिना बोले कितनी-कितनी बातें किया करती थी। उसकी ऊँगलियाँ सीने पर न जाने कितने प्यार के बोल कह दिया करती थी। कितने शौक से उसने घर पर कई जरूरी चीजें टुकड़ों-टुकड़ों में जुटाई थी।
वह थी भी बड़ी विचित्र। आई लव यू कहने में उसे एतराज था। वह चाहती थी कि सभी काम बिना बोले हो जाए। वह चुप रहे और मैं समझ जाऊँ कि वह क्या चाहती है। अक्सर मैं समझ भी जाता था पर उस दिन...!
उस दिन भी मैं ऑफीस से थोड़ी दूर उसके इंतजार में खड़ा था। वह आई और मेरे साथ बैठ गई। बड़े अच्छे मूड में थी वो। मैंने चाय ऑफर की तो खुश होकर कहा- आज आध्ाा घंटा नहीं पूरे दो घंटे तुम्हारे हैं। बोलो कहाँ चलना है? मैंने गाड़ी फ्लैट की ओर मोड़ी ही थी कि फिर उसके एक कलीग ने हमें देख लिया। वह बोली- यार, जब तक शादी नहीं हो जाती, हम नहीं मिला करेंगे। मैंने कहा-ठीक है। मैं आता हूँ तुम्हारे घर बात करने। तो बोली- यार, अभी नहीं। मुझे डर लगता है, कहीं वे मना कर देंगे तो क्या होगा?
काफी समझाया। वह नहीं मानी तो नहीं मानी। उस दिन मुझे भी न जाने क्या हो गया। मैंने सीध्ो कह डाला कि ठीक है अब मैं तुमसे तब ही मिलूँगा जब तुम्हारा ये डर चला जाएगा। या तो ये डर रहेगा या मैं। उसने काफी बुझे स्वर में कहा- तुम गलती कर रहे हो। मैं खुद इस डर से छुटकारा चाहती हूँ, इसलिए ही तो तुम पर यकिन है। उस दिन भी तो ऐसी ही बारिश थी और मैं अंजू को घर छोड़ आया।
महिनों बीत गए और फिर पूरे 5 साल। मैं जानता हूँ कैसे बीता यह वक्त। कितना कुछ बदल गया है। कुछ नहीं बदला तो यह फ्लैट और यादें! अब किसी पब्लिशर की बीवी है वो। कई किताबें भी उसकी प्रकाशित हो चुकी हैं और कहानी के किसी न किसी पात्र में आज भी उसका डर जीवित नजर आता है।
शिरिष बड़ी सी सीप मारते हुए बड़बड़ाया - 'वो जहर देता तो जमाने को पता चल जाता/ उसने बस ये किया, वक्त पे दवा ना दी।" फिर ध्ाीरे से लड़खड़ाते हुए बिस्तर में गीले ही लेट गया। बाहर बारिश अब भी मुसलसल जारी थी।