Saturday, April 23, 2011

बिन तेरे...



बिन तेरे तिल-तिल
खिसकती है जिंदगी
बिन तेरे कतरा-कतरा
जी रहा हूँ ये जिंदगी
तू क्यूँ नहीं समझती
मानती और जानती,
अहमियत अपनी
और अपने होने की
पता है तुझे...
जब तू होती है मेरे साथ
वो पल हो जाते हैं खास
कतरा-कतरा ही सही
मैं जी लेना चाहता हूँ तुझे
बता देना चाहता हूँ
मेरे दिल का सूनापन
वह वीरानी
जो घात लगाए बैठी होती है
निगल जाती है मुझे
पूरा का पूरा
बिन तेरे...
यहाँ-वहाँ भटकता हूँ मैं
खुद को अंदर तक टटोलता भी हूँ
एक अनंत, स्याह खोह होती है
अंदर भी और बाहर भी
तब परछाई भी छोड़ देती है साथ
बिन तेरे...
क्या तू नहीं जानती
टुकड़ों-टुकड़ों की यह मुलाकात
दर्द दे जाती है बेशुमार
एक शूल सा चुभता है सीने में
तब दिल के गहरे घाव पर
खुद ही लगाता हूँ मरहम
पर अब दवा भी कैसे करे असर
शूल पर शूल, अनगिनत और अनंत
दर्द के साथ देख बह रही है दवा
बिन तेरे...
हाँ, मुझे याद है
समझाया था तूने
क्यूँ न कम कर दें मुलाकातें
तब हर बार का यह दर्द
कभी-कभी उठा करेगा
तब मेरे पास कोई जवाब नहीं था
होता भी कहाँ
तूने दिल के इलाज में
मेरा सीना जो चीर दिया था
मैं जान गया था
तू जी सकती है बिन मेरे
पर क्या करूँ मैं कमबख्त
नहीं जी सकता बिन तेरे...