Tuesday, April 12, 2011

दस्तक!

खुशी हर जगह देती है दस्तक
पर आहट की पहचान कहाँ आसान
हर बार होता है इसका भेष नया
और नया होता है इसका अंदाज
मैं बड़ा खुशनसीब हूँ
हर बार-लगातार पहचान लेता हूँ इसे
फिर चाहे यह आए दबे पाँव
या फिर आए अपना रूप बदल
कई बार नजरों से पी लेता हूँ
कई बार छूअन से जी लेता हूँ
एक खुशबू भी है
जो कर देती है सारे दिन का काम
खुली जुल्फों से भी मिलता है
पूर सुकून आराम
अमावस सी खामोशी हो या
पूनम सी बिखरी खिलखिलाहट
लड़ाई के बाद मुँह फुलाई नाराजी हो या
ढेर सारी फिजूल सी चहचहाहट
दिन-दिन भर, टुकड़ों-टुकड़ों में
वह मासूम यूँ ही करती चली जाती है
मुझे खुशियों से तरबतर।