Sunday, May 29, 2011

मेरी जान...!



आज सुबह बड़ी जल्दी आई या सारी रात करवटों में बीती, पता नहीं। ...पर हाँ यह रोज की खिली-खिली, मतवाली और शरारती सुबह तो नहीं थी। अजीब सी, जैसे सूरज को आज निकलने के लिए जबरदस्ती भेजा गया हो कि जाओ लोगों को जगाने का समय हो गया। सूरज उबासी लेता हुआ मुझे मिला। पक्षी भी बड़े अनमने ढंग से पंख पसारते मिले। उनकी आवाजों में रोज की ताजी चहचहाहट नहीं थी। वे भी बस फॉर्मलिटी कर रहे थे।
इतनी बेमजा और बुझी सुबह मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी। हॉकर भी उनिंदा सा अखबारों का पुलिंदा मेरे आंगन में फेंक चुका था। मैंने अनमने ढंग से उनको टटोला। आँखें फाड़-फाड़ कर इनमें ताजगी खंगालने की कोशिश की... पर यहाँ भी सब कुछ बासी-बासी, बुझा-बुझा।
पड़ोसियों के सुबह-सुबह खिले दिखने वाले चेहरे भी बेरौनक नजर आए। वे भी व्यस्त दिखे, जबकि हमारा दरवाजा खुलते ही उनकी आँखों की चमक देखते ही बनती रही है। एक-दूसरे को देख फिकी मुस्कान फेंक हम अपने-अपने काम में लग गए।
क्या हो गया है आज? खैर मैंने इंटरनेट पर अपनी पसंद के गाने लगाकर खुद में जोश भरने की कोशिश की। थोड़ी देर में गाने भी मुझे पकाने लगे। हद हो गई ये तो! क्या हो गया है मुझे और सारी कायनात को। कुछ भी आज साथ नहीं दे रहा। सभी नाराज, निराश और दुखी नजर आए। सोचा क्यों ना कार, बाइक ध्ाोकर कुछ देर समय बिताया जाए। बाल्टी उठाई और कपड़ा लेकर सफाई में जुटा ही था कि लगा जैसे ये भी नहाना नहीं चाहते। मैंने कहा- रहने दो यार, जब इनकी ही इच्छा नहीं है तो मुझे क्या!
9 जैसे-तैसे बजे, बाई आई तो उसने भी नजरों से घर को टटोला। जो हमेशा बक-बक कर दिमाग खा जाती है, आज कुछ नहीं बोली। झाड़ू, पोछा और बर्तन साफ कर वह यह जा-वह जा। अब चिढ़ सी हो गई इस सुबह से। गुस्से में घर का दरवाजा बंद किया और सोचा शायद ढंग से नींद नहीं आने के कारण ऐसा है। सो कूलर फिर से ऑन किया और आँखें मूँदे लेट गया। कब झपकी लगी पता नहीं... पर एक छूअन का अहसास हुआ। गोल चेहरा, गंजी खोपड़ी, शरारती आँखें, छोटे-छोटे हाथ-पैर, गोलू से गाल, खिली मुस्कुराहट! नजर आई मेरी बेटी... मेरी जान...!
आँखें खुलते ही मेरा चेहरा खिल गया। माँ के साथ मेरी बेटी दो-चार दिन मुझसे दूर क्या है, लगता है शरीर की ऊर्जा जैसे किसी ने सोख ली हो और पूरी दुनिया घोर निराशा में डूब गई हो।
शुक्रिया बेटी... मेरी जिंदगी में आने के लिए... मुझे इंतजार है!