Thursday, May 19, 2011

सामंती सोच!



वह उकड़ू बैठा
कुछ सोच रहा था
मैं जानता था
मनोदशा, स्थिति
छोटा बेटा रोजी की खातिर
जिगर से दूर है
मझला दिमागी हालत
तो बड़ा शराब में लाचार है
एक-एक कर बिक
गए सारे बर्तन
बीवी निकली है
एक वक्त के आटे की जुगाड़ में
भूखे पेट काम कर
शरीर छोड़ रहा साथ
पूरे गाँव में अब उसे
कोई नहीं देता उध्ाार
जैसे ही मैं पास गया
आहट पा उसकी तंद्रा टूटी
उसके हाड़ में थोड़ा करंट आया
झट हाथ जोड़ उसने
छोटे मालिक के समक्ष शीश नवाया
तब एक सामंती सोच ने
उसकी ओर 50 का नोट बढ़ाया
वह बख्शीश ले घर की ओर दौड़ा
इध्ार मैं शान से, अपने ही हाथों
कर रहा था अपनी मूर्ति स्थापित!