Monday, May 23, 2011

बासंती मुस्कुराहट!



सुना है
कभी वह मुस्कुराती भी थी
यह भी सुना है
वह बात बसंत की है
या उसकी मुस्कुराहट से ही
आती रही थी बासंती बहार
तब बोरा जाती थी प्रकृति
झूमने लगता था तन-मन
एक अजीब से खुमारी
बेकरारी के होते थे दिन
नई कोपलें शाखों पर
कुछ दिल से झाँकती थी
नशा... नशा... बस नशा...
अब, पता नहीं क्यूँ
गुम है कहीं
मुस्कुराहट, बसंत और मैं!