Thursday, December 15, 2011

ये साथ एक बार और!

सोचता हूँ कुछ देर सुस्ता लूँ
झील किनारे बैठ कर कहीं
पी लूँ थोड़ा सा मौन
खुद के अंदर उतरूँ
जहाँ बरसों पहले
जाया करता था कभी
हर चीज को फिर
सलीके से सजाऊँ
आईने को साफ कर
वही 'पुराने" कपड़े पहन
नजर भर खुद को भी देखूँ
समय के साथ उग आई
सलवटों पर गौर करूँ
तुझे भी साथ खिंच
वही सब गुनगुनाऊँ
जो बाहर के शोर में
दब गया है शायद
यूँ ही आईने में
फ्रेम कर तस्वीर अपनी
फिर, हम निकल पड़े
नए सफर पर
शोर से दूर, उस ओर
जहाँ बस बातें हो
मेरी-तुम्हारी
आँखें बंद कर हम कहें
ऐ-जिंदगी, ये साथ
एक बार और, एक बार और