Tuesday, December 13, 2011

किरचें!

क्यूँ नजर आती है
दर्द की किरचें यूँ बिखरी हर ओर
संभल कर चलता हूँ, फिर भी
कमबख्त पैर पड़ ही जाता है
चुनने की कोशिश में
हाथ भी लहूलुहान कर बैठा हूँ
यकिं था, एक-एक कर
समेट ही लूँगा इन्हें
पर, बदकिस्मती तो देखो
जिस्म में खून का कतरा न बचा
न भाग, न समेट सकता हूँ
बस, किरचों में ही कहीं
तेरा अक्स खोजा करता हूँ
सोचा था कभी
बिखेरूँगा खुशियों के फूल हर ओर
पर न जाने कैसे
मैं तंगदिल

तेरा दिल तोड़ बैठा