Tuesday, November 22, 2011

धीमी-सी तेज जिंदगी!


पहले रेंगकर
फिर घुटनों के बल
यहाँ-वहाँ घूमती वो
पैरों पर धीरे से
सीख गई खड़े होना
कभी गिरती
फिर उठ खड़ी होती वो
सीख गई गिरकर, दौड़ना
हर चेहरे पर गड़ा दिया करती थी नजरें
अब चेहरों में से सीख गई वो
'अपनों" को पहचानना
रोते-रोते न जाने कब
खेलने लगी चेहरे पर मुस्कुराहट
फिर धीरे से सीख गई वो
आवाज को शब्दों में पिरोना
कुछ ऐसी है मेरी 'जिंदगी" की
धीरे-धीरे, बढ़ती तेज रफ्तार