Thursday, September 15, 2011

एक जोड़ा आँखों का!



अकेला होता हूँ
पर नहीं होता
कार चलाते हुए
पास की सीट होती है भरी
एक जोड़ा आँखों का
हर वक्त देख रहा होता है
खाना खाते, सोते
जागते, हँसते, बोलते
हर वक्त
कई बार मुझे देखकर
मुस्कुराता है
गलतियों पर चेताता भी है
लड़ना तो जैसे उसका शगल हो
हाँ, कभी प्यार भी जताता है
अक्सर मैं सोचता हूँ
इसके सिवा उसे कुछ काम नहीं?
पता नहीं कैसे वह पढ़ भी लेता है
मेरे दिल की बात
तब वह लड़ता नहीं
बस थोड़ा-सा 'छलक" जाता है
वाकई में...
साथ के लिए जरूरी नहीं
किसी का 'साथ" होना