Saturday, June 11, 2011

दर्द-बीज!


दर्द का बीज
दुखी मन में होता है अंकुरित
नकारात्मकता का खाद-बीज
पाकर पनपता है
असफलता का पानी
वृक्ष में कर देता है तब्दील
फिर इसके काँटे करते हैं
अपनों को ही छलनी
पर जड़ों में यदि डाल दो
सकारात्मकता का मठ्ठा

इसे सूखते देर नहीं लगती
एक और तरह का भी होता है दर्द बीज
जो प्यार में पनपता है
नकारात्मकता, असफलता
इसे वृक्ष बना देती हैं
सकारात्मकता में भी यह नहीं सूखता
इसकी छाँह में जो भी आया
हर हाल में उसने दर्द बेहिसाब पाया
हाँ, अंत में इस दर्द को
ही दवा बनते मैंने पाया