Tuesday, March 1, 2011

जो डर गया-समझो मर गया


मेरा दोस्त कार चलाना सीख रहा था। कार चलाते समय वह अक्सर यह कहता- देखना एक दिन मैं एक्सीडेंट जरूर करूँगा। मैं हमेशा यह समझाता कि यार ऐसा कुछ नहीं होगा, बस तू अपना यह डर दिल से निकाल दे। ...लेकिन एक दिन अचानक बाईक वाला सामने आया और डर से उसने ब्रेक की बजाय एक्सीलेटर दबा दिया। वह तो गनीमत है कि समय पर मैंने इस्टीयरिंग घूमा दिया और कार बाईकवाले से न टकराते हुए डिवाइडर में जा घुसी। बाल-बाल बचे...! पर इस घटना के बाद मेरा उसकी ड्रायविंग पर से भरोसा उठ गया। भले ही अब वह अच्छी ड्रायविंग करता हो, लेकिन मेरी नजर में अब वह डरपोक ड्रायवर है, जो कभी भी दुर्घटना कर सकता है।
मेरी यह सोच है (हो सकता है आप इससे इत्फाक ना रखें) कि जो काम आप डर को साथ लेकर करते हैं, एक न एक दिन उसमें आप ही के कारण कुछ गड़बड़ जरूर होती है। इसी प्रकार का एक उदाहरण और है।
जब मैं 15-16 साल का रहा होऊँगा, उन दिनों मैं और मुझसे दो साल छोटा मेरा भाई व संगी-साथी गाँव के पास स्थित नदी पर नहाने जाया करते थे। नदी काफी चौड़ी और गहरी थी। एक दिन भाई को सूझी की दादा क्यों ना हम तैरकर नदी पार करें। मेरे सामने यह छोटे भाई का चैलेंज समान था। यदि ना करता तो भाई को लगता दादा डर गए हैं और हाँ में यह डर था कि यदि बीच में साँस टूट गई या थक गए तो मर जाएँगे। अंतत: अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी यह तैराकी शुरू हुई। मेरा भाई मेरी तुलना में मजबूत काठी का है। वह तैरे जा रहा था और मुझे डर लग रहा था कि आज तो जरूर डूब जाऊँगा। नदी के बीच में पहुँचते-पहुँचते मेरी हिम्मत लगभग जवाब दे गई। मैंने चिल्लाकर भाई को कहा- अब तैरा नहीं जाता, मैं डूब रहा हूँ। भाई बेचार घबरा गया! वो चिल्लाकर बोला-दादा मरवाओगे क्या! यहाँ तो मैं भी आपकी मदद नहीं कर सकता। हाथ चलाओ बस। कुछ भी मत सोचो।
पता नहीं उसकी बातों का असर रहा या इस सोच का कि अब डूबना तय है अंतिम कोशिश कर लेते हैं। हाथ-पैर जवाब दे चुके थे, लेकिन हिम्मत पता नहीं कहाँ से आ गई। पागलों की तरह तैरने लगा और अंतत: लग गया किनारे! बहुत देर तक किनारे पर पड़े रहा, फिर नदी को देखा। मेरे और भाई के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी। हमने आज अपने गाँव ध्ातरावदा की कालीसिंध्ा नदी को जीत लिया था। बड़ा मजा आया। ...लेकिन इस जीत की खुशी ने क्या गजब काम किया कि इस बार हम आसानी से वापस अपने किनारे तैरकर पहुँच चुके थे। इसके बाद कितनी ही बार नदी को पार किया!
हाँ, हमने कभी बाढ़ में कालीसिंध्ा पार करने की कोशिश नहीं की। क्योंकि यह हम भी जानते हैं कि यह बेवकूफी भरा कदम होगा। एक कोल्डड्रिंक कंपनी के विज्ञापन की पंच लाइन है कि 'डर के आगे जीत है"। वाकई में यह काफी हद तक सटिक है कि जिसने डर से जीतना सीख लिया, जीतना वह अपने आप सीख जाएगा। हाँ...कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती है, जहाँ डर जरूरी है। जैसे सामने साँप आ जाए और आप बिना डरे उसने पकड़ने दौड़ पड़ें। यह आपको तय करना है कि किन परिस्थितियों में डरना चाहिए। कुछ स्थितियाँ ऐसी होती है, जब डर हमें विपदाओं के प्रति सचेत भी करता है।
...लेकिन कुछ डरपोक ऐसे भी हैैं, जो हवाई विपदाओं के कारण वर्तमान में घुले जीवन के रंगों को रंगहीन कर देते हैं। इन डरपोक लोगों के कारण उनके सगे-संबंध्ाी हमेशा परेशान रहते हैं। उनका अध्ािकांश समय यह समझाने में जाया हो जाता है कि यह डर की कोई वजह नहीं है। जो इंसान अपने मन में डर पाले रहता है, वह ध्ाीरे-ध्ाीरे वहमी भी होता जाता है। उसे यही लगता है कि उसका डर सही था या जरूर यह सही निकलेगा। यदि मौके से एक-दो घटनाएँ उनकी सोच के अनुसार हो गई तो समझो जीवन भर का झंझट। अब ऐसे डरपोक इंसान के पास खुदा भी आकर समझाए तो वह मानेगा नहीं।


- इंसान की हार का सबसे बड़ा कारण उसका 'डर" होता है।
-जिसने डर को जीत लिया, समझो उसे जीतना आ गया।
-डरपोक हमेशा हवा में विपरित परिस्थितियाँ बना लेता है।
-डर जीवन के रंगों को रंगहीन बना देता है।
-डरपोक के सगे-संबंध्ाी हमेशा पीड़ित रहते हैं।
-डर से दो कदम आगे ही आपको जीत मिलेगी।
-कहते हैं-हिम्मते मर्दां, मददे खुदा