प्यास वो कतई नहीं जो पानी से ही बुझ जाए तो फिर, क्या है? कमबख्त, तेरे मिलने से दहकती है ना मिलने से और भी भड़कती है मिलो तो, ना मिलो तो हर, हर परिस्थिति में वो, वैसी ही है जिंदा और मैं? अनंत तक भटकते रहने के लिए अभिशप्त डरता हूँ, और चाहता भी यह ऐसी ही, जैसी पहले थी, अभी है बनी रहे मैं जानता हूँ यही, हाँ यही तो है प्यास पर शायद ही समझा पाऊँ तुझे क्या है प्यास!
धीरे-धीरे आसमान से उतर कहीं खो जाने को बेताब ये अस्ताचल सूरज झुंड के झुंड पंछी भी कहीं पेड़ों में हो रहे गुम दिन भर की गर्मी न जाने कैसे हवाओं में घुल ठंडी पुरवाई का रूप ले चुकी दूर कहीं डूबती-सी देवालयों से आती घंटियों की आवाज उस पर सारी प्रकृति को पेंसिल से हल्के-हल्के धूसर करने का षड्यंत्र रोज पूरी कायनात में गौधूली होते ही घुल जाती है शराब और, नशे में डूबा मैं पाता हूँ खुद को तेरे आगोश में फिर न जाने कैसे सब स्याह हो जाता है न 'तू" तू होती है न ही 'मैं" मैं कमबख्त, इसलिए ही हर शाम तेरी तरह और, तू शाम की तरह लगती है रूमानी
मेरी यादों का किंवाड़ (दरवाजा) हर वक्त खुला होता है कमबख्त नहीं चाहता उसमें सरकना पर जिस तरह वह बंद नहीं होता उसी तरह मैं खुद को नहीं रोक पाता किस्मत ही मेरी ऐसी है या सारी किताबें एक हो गई पता नहीं, पर जब भी मैं दाखिल हुआ उस किंवाड़ के पार किताबों के उस समंदर में हर बार, हर बार हाथ आई तेरे ही नाम की किताब पन्नो दर पन्नो लिखी होती हमारी कहानी वो मिलना, साथ चलना पर उन सारी किताबों का क्यों गुम है आखिरी पन्ना?
काश की जिंदगी बनिये की दुकान न हो दो ग्राम खुशी दस ग्राम रोना न हो खुद से उम्मीदों का बोझ अपनों से फायदे की आस न हो जीत क्या, हार क्या तेरा-मेरा वाली बात न हो काश की जिंदगी बनिये की दुकान न हो जानता हूँ हर कोई तौलता है नफे-नुकसान के तराजू में बस बातें ही होती है दिल की हमेशा चलता दिमाग है अक्लवालों की इस दुनिया में इस हद तक रिस गया व्यापार हर रिश्ते की है कीमत हर संबंध का कोई खरीदार कहीं सुना है प्रेम में नहीं होताकोई हिसाब पर, वहाँ भी तो चलता मेरा ज्यादा, तेरा कम कोई तो होगा ऐसा जो नुकसानी का सौदा करे और, फिर कभी मेरा मौलभाव न करे काश की जिंदगी बनिये की दुकान न हो
ख्वाहिशों की गली से
जब भी निकला
अतृप्त, प्यासा, व्याकुल
हताश, निराश ही मिला
वहाँ की हर चीज लुभावनी
आकर्षक क्यों?
सवाल तो यह भी है
वह गली ही क्यों?
फिर भी, हर बार
नई ललक के साथ गुजरता हूँ
कई खुशियों को काँख में दबाए
पर, कमबख्त हर बार होती है कसक
कुछ छूट गया है उस गली में
अगली बार फिर जाऊँगा
चुन लाऊँगा तमाम जगमगाहट
पर, जब भी जाता हूँ
बुझा ही लौटा हूँ
क्यों, उठते हैं
नए अरमान दिल में
मैं फिर भटकने को मजबूर
ख्वाहिशों की गली में
काश कि मैं
न मजदूर होता, न मालिक
न ग्राहक, न ही व्यापारी
दरोगा होता न चोर होता
न राजा, न प्रजा
रक्षक या भक्षक भी नहीं
क्या नेता, क्या मतदाता
अफसर, कर्मचारी भी नहीं
फिर भगवान, राक्षस भी क्यों
काश कि मैं
एक 'इंसान" होता
तब शायद
किसी आँख में न आँसू होता
न ही कहीं कोई भूखा सोता
काश
कि मैं इंसान होता