रोज दिन, रात गुजरते हैं यूं जैसे वक्त का डेरा हो मुंडेर पर मेरी अरसा हुआ मुस्कुराए उसे बस एकटक देखता है सूरत मेरी यकिं हो चला अब मुझे कि न बदलेगा ये कभी ये मेहरबां न हो तो क्या साथ तो न छोड़ेगा ये कभी तभी एक सुबह ऐसी आई जब आंखें खुली मुंडेर मेरी सूनी मिली और, वक्त के निशां चेहरे पर छूटे मिले
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