Tuesday, July 9, 2013

छूटा सिरा...


राह तो तेरी ही चला हूं मैं
पर जो सिरा तुझ तक जाता था
छूट गया है न जाने कहां
भूल यकिनन है मेरी
क्यों नहीं थाम पाया 
हाथों में हाथ तेरा
क्यों नहीं दिला पाया 
अपने वजूद का यकिन तुझे
क्यों नहीं बता पाए 
ये दिल, आंखें
बसी है इनमें तस्वीर तेरी
क्यों नहीं समझा पाया
कितनी घुटन है बिन तेरे
क्यों नहीं जता पाया 
हां, मैं करता हूं प्यार तुझे
क्यों नहीं दिखा पाया
मोहब्बत की गहराई तुझे
और, ये कमबख्त आंखें
जो हर पल बुनती है ख्वाब तेरे
नहीं बता पाई 
मेरे अंदर की बेकरारी तुझे
बस भटक रहा हूं 
नहीं जानता
ये तकदीर अब कहां 
लेकर जाएगी मुझे 
छूट गया है जो सिरा
मेरा रोम-रोम हर जगह
टटोल रहा है उसे