Tuesday, April 28, 2015

उम्मीद



एक ठूंठ जब ताकता है आसमान
उसके गर्भ में होता है
दरख्त बनने का अरमान
ताकि फिर आबाद हो उसकी शाखें
तिनका-तिनका जुटा
कुछ पंछी फिर नीड़ बनाएं
फिर चोंच लड़े
फिर उम्मीदों के पंख
आसमान से ऊंची उड़ान भरें
कुछ मुसाफिर शाख तले
घड़ी भर आराम पाएं
कहीं किसी दिशा में
जब उठे तूफान
यही दरख्त
बांह चढ़ा
जड़ों को और गड़ा
रोक दे उसका रास्ता
पर, नहीं है आसान
हर वक्त
आंखों में एक ही सपने का पलना
फिर उसके लिए लगातार जुटे रहना
तप के लिए तपना भी होता है
भला कभी उम्मीदों की बारिश
आसानी से हो पाई है
तो सुन
मैं भी, हां मैं भी
उम्मीद से हूं
तू छू दे मुझे
और मैं
दरख्त बन जाऊं