छोड़ने की बात वो कहते रहे हम पकड़ने पर जोर देते रहे हम निरे बेवकूफ थे बेवकूफ ही रहे वो समझदारी से ये बात समझते रहे वो चलाते रहे हम चलते रहे कब समझेगें हम पता नहीं वो दिल को हमारे खिलौना समझ खेलते रहे हम देखते रहे यूं ही धीरे-धीरे टूटते रहे ऐसे ही एक दिन हम कबाड़ में फेंके जाते रहे हम निरे बेवकूफ थे बेवकूफ ही रहे हां, सच तो यह भी है छोड़कर हमें उनसे हम छूटे नहीं अपनी ही समझदारी पर कईं बार वो रोते रहे हम निरे बेवकूफ थे बेवकूफ ही रहे
अरसे से नहीं मिला मैं नहीं की बातें खुद से धूल की मोटी परत आ जमी है भीतर तक हर ओर बिखरे पड़े हैं शब्द बेतरतीब, बेख्याल सोचता हूं समेटूं, सहेजूं शब्दों को फिर अर्थ दूं धूल के पीछे छूपी संवेदनाओं को जरा शक्ल दूं बहुत हुआ, कसम से आ जरा अब पास मेरे घड़ी भर तू भी सांस ले दो घूंट जिंदगी के फिर संग पी मेरे मेरी संवेदनाओं, शब्दों को फिर से पिरोकर बातों का नाम दे मुझ से फिर मिला दे मुझे इसे फिर मोहब्बत तक अंजाम दे
हर वक्त मैं हद में रहा जिंदगी यूं ही पास से मुस्कुरा के गुजर गई चाहता था उसे छूना जी भर जीना नहीं मिली खुद से इजाजत मुझे डर था, कोई समझेगा काफिर तो कोई कहेगा मौकापरस्त मुझे डर ये भी था कि छूने से कहीं मैला ना हो जाए दामन मेरा तोहमतों के बाजार में कहीं कोई ले ना ले नाम मेरा फिर, मैंने बस इतना किया मैं हद में रहा और जिंदगी यूं ही मुस्कुरा के गुजर गई
एक ठूंठ जब ताकता है आसमान उसके गर्भ में होता है दरख्त बनने का अरमान ताकि फिर आबाद हो उसकी शाखें तिनका-तिनका जुटा कुछ पंछी फिर नीड़ बनाएं फिर चोंच लड़े फिर उम्मीदों के पंख आसमान से ऊंची उड़ान भरें कुछ मुसाफिर शाख तले घड़ी भर आराम पाएं कहीं किसी दिशा में जब उठे तूफान यही दरख्त बांह चढ़ा जड़ों को और गड़ा रोक दे उसका रास्ता पर, नहीं है आसान हर वक्त आंखों में एक ही सपने का पलना फिर उसके लिए लगातार जुटे रहना तप के लिए तपना भी होता है भला कभी उम्मीदों की बारिश आसानी से हो पाई है तो सुन मैं भी, हां मैं भी उम्मीद से हूं तू छू दे मुझे और मैं दरख्त बन जाऊं
बेटी, प्यारी बेटी... अब 5 साल की हो चुकी है। मासूम, खुबसूरत, लाजवाब और बेहद भावुक। मेरे ऑफिस से लौटने का वक्त है, रात की डेढ़ बजे। ...और वो आधी रात में भी अचानक जागकर मां से पूछती है-दाता आए। जैसे ही मां कहती है-हां, बस फिर नींद के आगोश में चली जाती है। उसका यह लाड़ मेरी रात को हसीन कर देता है। अल सुबह उसके जागने का वक्त होता है, उस दौरान मैं अमुमन सोया रहता हूं। कई बार मेरे गाल पर एक गीली किस का अहसास होता है...अद्भुत। एक बार ऐसी ही गीली पप्पी मिली तो मैंने पूछ लिया कि अरे ये क्यों... जवाब क्या दाता सुबह आप लेट उठते हो तो गुड मॉर्निंग की जगह मैं किस कर देती हूं। नींद नहीं खराब होती है ना आपकी... आह... क्या लड़की है मेरी। कभी लगता है कि मैं शायद इसे डीजर्व ही नहीं करता। कितनी मासूम और प्रेममयी है। कितनी खुशियों से भरी, कितनी जोश से लबरेज। वाह युगा... लव यू। कितने ही किस्से हैं उसके, जो मुझे हर पल खुशियों और प्यार से भरा रखते हैं। एक बार कमाल किया उसने। वह और सोना अपनी नानी के यहां रात रूकने वाले थे। युगा शाम को रोने लगी की दाता की याद आ रही है। सोना ने समझाया कि शाम को तो वैसे भी दाता ऑफिस होते हैं, फिर याद का नाटक क्यों कर रही है। जैसे-तैसे उसे चुक कराया। रात उसने नानी के यहां ही गुजारी, लेकिन सुबह होते ही फिर दाता के पास चलने की रट लगाने लगी। सोना 5 मिनिट में लौट आने की डील पर मिलाने ले आती है। आते ही युगा मुझसे ऐसे गले मिलती है, जैसे बरसों से बिछड़े हों। फिर गले मिलते ही कहती है, बाय। बस मिलने आई थी आपसे। जाते-जाते पूछती है, हां याद आया... रात में आपने खाना खाया था? मैंने कहा- हां, तो अगला सवाल कहां से? जब बताया कि बाहर से पैक करा लाया था, तो जवाब- फिर ठीक है। मैं शाम से सोच रही थी, आप खाना क्या खाओगे? ऐसा नहीं है कि वह सिर्फ मेरे लिए ही इतनी भावुक है। मेरे दोस्त योगेश के घर हम गए, उसकी बेटी किशु भी युगा के ही बराबर है। उसका जन्मदिन आने वाला था, मैंने किशु से पूछा कि तुम्हे क्या चाहिए तो उसने कहा मेरी विश है कि स्कूल बेग मिल जाए। बस युगा के दिमाग में ये अटक गया। कईं दुकानों पर मां-बेटी भटके, तब जाकर युगा की पसंद का बेग मिला। किशु को गिफ्ट करने के बाद मुझे फोन लगाकर रिपोर्टिंग की गई। युगा का पहला वाक्य था- दाता, उसकी विश पूरी हुई। उसे बेग मिल गया। मैंने कहा कि विश तो किशु की पूरी हुई है, तुम इतनी खुश क्यों हो? तो जवाब मिला- दाता किसी बच्चे की विश पूरी होना कितना अच्छा होता है। मुझे बहुत मजा आया कि उसकी विश पूरी हो गई। वाह... लव यू युगा... तेरी हर विश पूरी होगी।
ये तेरा असर है कि हर दवा अब है बेअसर दुआ किजे कि कोई दुआ का तो हो जरा करम न जाए दर्द, तो ना सही बस, घड़ी भर रूक पूछ ले वो सितमगर खैरियत मेरी पता है कईं बार कईं-कईं बार एक चम्मच सुबह, एक शाम दवा की तरह मिलती है हंसी तेरी वो ही अगले दिन तक बन जाती है जीने का सहारा मेरी सुन ओ सितमगर जा, जरा देख आइने में खुद को वहां भी नजर आएगी तुझे, तेरे अक्स में तस्वीर मेरी तुझे क्या पता, क्या मजा है इस दर्द में तेरे जहां खंजर भी तेरा और, जिंदगी भी तेरी