Thursday, December 27, 2012

'सम्मान"


कोख में पल रही है वह
मैं डरता हूं
न लाऊं उसे
क्या है यहां ऐसा
मैं दे पाऊंगा जो उसे
आ ही गई है अब
बहुत-बहुत घबराता हूं
बता भी नहीं सकता
बताऊं भी किसे
मेरी ही बेटी है बस वह
और दुनिया के लिए
महज चारा
अखबार भी पढ़ेगी वह
और देखेगी जहान की हकीकत
सवाल भी करेगी वह
और समझेगी भी
नजरों में उतर आई हवस को
डरता हूं मैं
तब कैसे छूपा पाऊंगा
मेरी ही 'नपुंसक" कौम को
उससे और उन तमाम बेटियों से
जिन्हे चाहिए भी तो महज
आधी आबादी का 'सम्मान"
 

Thursday, December 13, 2012

कब...


पनाह में छुपा ले मुझे
कि रास अब आती नहीं ये दुनिया
सदी के मानिंद
गुजरता है हर एक पल
हर शख्स लगता है अजनबी
और चुभती है शूल की तरह जिंदगी
मैं अटका हूं कहीं
कि कब आएगा वो कल
जब काली बदली बन
बरसेगी तू घनघोर
जब शरद की चांदनी बन
कर देगी शीतल मेरा हर पोर
जब सहरा के इस प्यासे को
नख-शिख तक कर देगी तर
कब...कब...कब...
बता ए-पत्थरदिल
जब तू पिघल कर
बहने लगेगी उस दरिया की तरह
जो पनाह देगा मुझे
और मैं डूब जाऊंगा
अनंत-अनंत गहराई में कहीं

Friday, November 16, 2012

काश...


काश, ये निराशा
मेरा सर्वत्र निगल जाए
ना कोई उम्मीद फिर कभी
अपना फन फैलाए
डूब जाऊं अंधेरे में इस तरह
ना फिर कभी 'स्व" नजर भी आए
बस मैं रहूं, मुझमें ही सिमटा
ना कोई फिर दस्तक भी दे पाए
सब कुछ यहीं थम जाए
यहीं, हां बस यहीं रूक जाए
ना कोई साथ चलने की
फिर कभी आशा जगाए
किश्तों की बजाय, काश
मौत अभी ही आ जाए

Wednesday, October 24, 2012

रोशनी की प्यास...


हर वक्त एक द्वंद चलता रहता है। शायद यह सबमें चलता होगा। कोई एक मैं ही नया नहीं हूं... हो सकता है सबको नजर भी आता हो... अपने मन में बहुत कुछ हर वक्त घटता सा। कई बार बड़ी-बड़ी घटनाएं सुनामी समान अंदर ही अंदर उठती है... बाहर एक दम सब शांत... किसी को कोई आभास नहीं... पर अंदर का आभास मुझे ही है... सब तबाह... सब... फिर नया होगा तबाही के बाद... एक उम्मीद... एक लाचारी... हार... संघर्ष... और वही रोशनी की ओर प्यासी सी दौड़। क्या बस इतनी-सी है ये जिंदगी।
प्यास इतनी बड़ी होती है... कि हर बार भी हारकर मैं उठ खड़ा होता हूं। शायद इस डर से भी कि कहीं यहीं प्यासा ना मर जाऊं... या फिर यही नियति है, जिसे मुझे चुनना ही है... कोई च्वाइस नहीं। च्वाइस तो होती ही कहां है, जिसके पास होती होगी... क्या उनके पास जिंदगी की चाह होती होगी? शक है मुझे, क्योंकि प्यास ही तो जिंदगी है... वह रोशनी ही तो है, जिसकी चाह में मैं अंधेरी टनल में यहां-वहां टकराते हुए भी घायल, परेशान, हताश होकर भटक रहा हूं।
मुझे मालूम है, इस जन्नात की हकीकत... रोशनी कभी किसी का इंतजार नहीं करती। वह मरीचिका है... जब जहां उजियारा, उस वक्त के लिए, बस उसी वक्त तक के लिए वह उसकी है... वरना तो बस भागना ही ही है अपनी प्यास के साथ... अंधों समान रोशनी की चाह...।
बाहर की सुनामी बरसों बरस में एक बार आया करती है, पर मेरी सुनामी की फ्रिक्वेंसी इतनी है कि अब तबाही में ही रहने की आदत हो गई है। नहीं चाहता कुछ भी व्यवस्थित करना... बस दौड़ते रहने की चाह है... बिना सोचे, जाने, समझे... कई बार तो उजियारे की चाह में जुगनूओं को भी एक-एक कर बिन लेता हूं... शायद कभी रोशन हो मेरा स्व... शायद सुनामी थमे... शायद जिंदगी की रेस में जिंदगी से मुलाकात हो... शायद रोशनी किसी दिन मेरा कंठ तक तर कर दे... शायद...
 

Thursday, October 18, 2012

इश्क...


न छू इसे, रहने दे ऐसा ही
जख्म गहरा है कितना
देखूं तो एक नजर भर
परख लूं यह भी
दर्द कब खुद
बन जाया करता है दवा
और इसलिए भी मत छू
विष बीज है यह कमबख्त
करता है छूते ही
सीधे दिल पर असर
न दवा आती है काम
न करती है दुआ असर
चाहकर भी कहां मर पाएगी तू
खुद जहर बनकर भी
जिंदा रह जाएगी तू
 

Tuesday, October 16, 2012

मौन की भाषा...


काश कभी ऐसा हो
मौन ही शब्द बन जाए
तब तेरा दिल सीधे जान लेगा
इस दिल के हाल
दोनों कर लेंगे मिलबैठ
दूर सब शिकवे-शिकायत
बता भी देंगे जख्म
किस कदर गहरें हैं कमबख्त
और इकदूजे को
लगा देंगे राहत का मलहम
दिन-दिन भर करते रहेंगे
दिल्लगी की बातें
न समय, न शब्द
बस बोलेगा सिर्फ मौन

Monday, October 15, 2012

उम्मीद...


चुपके से सिरहाने रख आया हूं
कई ख्वाब सुनहरे से
कोई एक दिन तो मेरा होगा
जब ये तैरकर जा बसेंगे तेरी आंखों में
उसके बाद यकिनन
हर पल मेरा होगा
फिर, सपनों से दूर कहीं
बुन रहे होंगे हम
एक हकिकत की दुनिया अपनी-सी
जो कुछ-कुछ होगी मिठी-सी
थोड़ी होगी सोंधी-सी