Tuesday, May 17, 2011

तलहटी का कोना!



सब कुछ शांत
किसी झील की मानिंद
पता नहीं एक छोसा-सा
कंकड़ कहीं से उछला
समा गया
पानी में हल्की हलचल
स्पष्ट, तस्वीरें हिलीं
दूर तलक झीनी सी लहरें
फिर सब कुछ शांत
पंछी, पेड़ों, किनारों
आसपास को
नहीं चला कुछ पता
बस तलहटी में कहीं
जो बचा था एक कोना
वह अब नहीं रहा सूना!


 

Friday, May 13, 2011

उसके नाम जिंदगी...



मैंने जिंदगी की उसके नाम
वो लम्हों की खैरात देती रही
कई बार सोचा मैंने
क्यूँ करती है वो ऐसा?
शुरू से लेकर अंत तक
उन सारे लम्हों को टटोला
जिया था मैंने जिन्हे
अपना समझ, पूरी शिद्दत से
तब मैंने जाना
खैरात होती है सिर्फ
और सिर्फ गुजर के लिए
यह वो बख्शीश है
जो भरपूर उपयोग के बाद
बच गई होती है
जिसे किसी की झोली में
डाल भी दिया जाए
खजाने पर फर्क नहीं होता
नाम हो जाता सो अलग
अब कोई तो बताओ
खैरात पर कोई भला
जिंदगी नाम करता है?





 

ईमान का खून!



कई चेहरे देखे, कई जुबाँ सुनी
ईमान का जिक्र हर जगह पाया
जब निकला इसकी खोज में
मैं कहाँ-कहाँ नहीं भटका
अपने अंदर भी टटोला
जंगल, रेगिस्तान
गाँव, शहर सब छान मारे
निराश, हताश जब लौट रहा था
दूर आसमान में मंडराते दिखे कई गिद्ध
और नजरें दौड़ाई
भीषण गर्मी में बबूल के नीचे
एक महिला नजर आई
बिखरे बाल, कपड़े तार-तार
पास ही आँसूओं से तरबतर
पड़ा था एक कंकाल
मुझे देख वह बदहवास सी
आ चिपटी मुझसे
वह अब चीखे जा रही थी
तुम लौटा दो- मेरा ईमान
एक झटका लगा
जिसकी खोज में दर-दर भटका
क्या वह अब दुनिया में नहीं रहा
इसकी हत्या हुई या अपनी मौत मरा
कुछ सूझ नहीं रहा था
महिला चीखें जा रही थी
कंकाल देख लग रहा था
यह भूख, प्यास से खुद ही मरा
मुझे भी रुलाई फूट पड़ी
मैं भी विलाप करने लगा
पर मैं देखता हूँ
दोनों के हाथ रंगे थे
इतने में दूर एक हुजूम नजर आया
उनके कपड़े और हाथ दोनों रंगे थे!








 

Monday, May 9, 2011

'अफीम"



खुद को खत्म करना
कोई मुश्किल काम नहीं
बुजदिलों का काम है ऐसी खुदकुशी
इसमें वह मजा भी कहाँ?
चंद लम्हों में ही काम तमाम
आत्मा जब छोड़ देगी शरीर
फिर बचेगा ही क्या?
तो भला इस मौत में
वह रस रहा ही कहाँ?
जिंदगी से खुशियाँ चाहने वाले
ढूँढ ही लेते हैं रोज मौत के तरीके
मैंने भी अपने लिए
की है तिल-तिल मौत मुकर्रर
पल-पल दरकता हूँ
अब मैं रोज मरता हूँ
बदहवासी, उद्वेलन, विचलन
हताशा, निराशा, गम
वहम, नशा, दर्द
पागलपन और दीवानापन
इस मौत में रचे-बसे हैं
इस खुदकुशी का एक नाम भी है
जिसे दुनियादार 'प्यार" कहते हैं
और मैं कहता हूँ इसे 'अफीम"


 

Saturday, May 7, 2011

मेरी भगवान!



शून्य, बस शून्य
सन्नााटा, घुप अंध्ोरा
चारों ओर समुद्र
इन सबमें डूबा मैं
फिर भी पल रहा था
तेजी से बढ़ रहा था
क्यों, कैसे
चमत्कार ही तो था
बस एक डोर के सहारे
जो शायद जुड़ी थी मेरे पेट से
और एक सिरा कहाँ था
मैंने टटोला भी
आँखें फाड़-फाड़
देखने की कोशिश भी की
अंध्ारे में कुछ नजर न आया
वह डोर मुझे सिंचती रही
बड़ा और बड़ा करती रही
नौ माह, हाँ नौ माह
मैं लिपटा रहा उस डोर से
मैं जान गया था
यही मुझे सिंच रही है अपने खून से
फिर मैंने यह भी जाना
यही है मेरी भगवान
अंध्ोरी खोह से जब मैं
बाहर आया, डरा हुआ था
खूब रोया-चिल्लाया भी
तब मैंने पहली बार देखा
मेरी डोर का रूप
कितनी खुबसूरत, सलोनी
उसने झट से मुझे सीने से चिपका लिया
मैं शांत, निश्चिंत, निडर हो
दुबक गया उसकी गोद
आज भी वही डोर मुझे सींच रही है।

 

Friday, May 6, 2011

कसौटी!



हर बार यूँ न परख मुझे
तूझे यह देखना होगा
जब खुद को मैं झोंकता हूँ
सूर्ख हो चुकी भट्टी में
हर बार पिघलता हूँ
फिर लावा बन निकलता हूँ
तेरी कसौटी की जो बूँदें
मेरे तन को छूती हैं
वे राहत तो देती हैं
पर मैं छूट जाता हूँ अगढ़ा
फिर से मुझे ढलना होता है
तेरी पसंद के आकार में
पर तू यह नहीं जानती
हर बार अंदर कुछ तो बदलता है
पगली, फिर क्यूँ यूँ परखती है मुझे?





 

Sunday, May 1, 2011

थाम ली जिंदगी !



जब मैंने उसे छूकर देखा
वह चौंक गई
उसे कुछ पराया सा स्पर्श लगा
झील सी आँखों को
उसने और गहरा, फैला दिया
कठोर चेहरा कर
फिर न छूने की मौन चेतावनी भी दी
इस बार मैंने उसे छूआ नहीं
बल्कि जकड़ लिया
वह छटपटाई, कसमसाई
और ध्ाकियाते हुए चली गई
शायद वह घबराई हुई थी
या फिर डरी हुई, या दोनों
मुझे अपने दुस्साहस पर
गुस्सा भी आया, शर्म भी
मैं मनाने, समझाने
पीछे-पीछे भागा
खुब चिल्लाया
दहाड़े मार रोया भी
मैं उसे समझाना चाहता था
ऐ जिंदगी...
मैं तुझे देखना, छूना चाहता हूँ
मौत आने तक तुझे ही
बस तुझे ही गले लगाना चाहता हूँ
पर हाथ से छूट चुकी थी वह
मैं बदहवास, पागलों सा
यहाँ-वहाँ दौड़ रहा था
तभी मेरी नींद उचट गई
...और मैंने खुद को
जिंदगी के आगोश में पाया
फिर मैंने जिंदगी को
बहुत मजबूती से जकड़ लिया!