Monday, July 4, 2011

'प्रेमगीत"





जब हम बात करते हैं
तो झगड़ते हैं
मौन करता है हमें बेचैन
दूरी में सोचते हैं
क्या चल रहा होगा वहाँ
फिर जब मिलते हैं
होती है शिकायतें तमाम
इक-दूजे की गलतियाँ
बैठ जाते हैं गिनाने
फिर पता नहीं कैसे
लगते हैं 'प्रेमगीत" गुनगुनाने

बदल गया हूँ!



क्यों हूँ मैं ऐसा
जैसा पहले नहीं था
पहले कैसा था
जैसा अब नहीं हूँ
क्या मैं बदल गया हूँ
या तब बदला हुआ था
आईने के सामने खुद को
खुब उलट-पलट कर देखा
अंदर तक झाँका, परखा
सही कहते हैं वे
वाकई मैं बदल गया हूँ
अच्छा-भला था दुनियादार
अब फखत 'प्यार" हूँ

Sunday, July 3, 2011

मासूम ख्वाब!



सोने के बाद और
गहरी नींद के ठीक पहले
चादर से सरकते हुए
तकिये की झालर से
बालों की रहगुजर कर
आँखों में आ बसते हैं
अनगिनत मासूम ख्वाब
वहाँ नहीं होते
ध्ार्म, समाज, रिश्तों के बंध्ान
दुनिया से दूर इस दुनिया में
चलती है तो बस दिल की
देखता, सुनता, महसूसता
भी है तो बस दिल ही
और जब दिल की चलती है
तो पल में जी लेता हूँ जन्म-जन्मांतर

साथ चलें!




बचपन से लेकर
जवाँ होने तक
एक ख्याल हमेशा
देता रहा है दस्तक
नहीं होगी नजर कमजोर
झुर्रियाँ, पके बालों से
रहूँगा कोसों दूर
पर जबसे दादी ने यह कहा
अब जाना है दुनिया से दूर
सोचता हूँ क्यों नहीं हो रहा
मैं भी तेजी से बूढ़ा

किश्त...



मकाँ की किश्त
तो कभी गाड़ी की
हर वक्त चिंता
बस किश्त की
सोचा था कभी
जिंदगी जिऊँगा एकमुश्त
पर अब किश्तों के बीच से कहीं
निकाल रहा हूँ किश्तों में जिंदगी

माफी...



माफ करना ए-जिंदगी
इस बार बस दाना-पानी
अगले जनम तुझे
भरपूर जी लेंगे

Saturday, July 2, 2011

इस बारिश...



सोचा था इस बारिश
इस कदर बरसोगे तुम
कभी रोपा था जो बीज
उसे अंकुरित कर दोगे तुम
बरसों-बरस का सूखा
इक पल में हर लोगे तुम
दिख रही हैं जो दरारें
सोता बन झरोगे तुम
बेजान हो चुके ठूँठ को
कोपलों से भर दोगे तुम
पथरीली इस नद में
उफान ला दोगे तुम
रोज... रोज...
घनघोर घटा बन छाते हो
फिर निराश, हताश छोड़
किसी और राह चले जाते हो
हर पल... हर क्षण...
चातक सम ताकता हूँ