Saturday, November 30, 2013

अहसास तेरा...


जब भी तन्हाई घेरती है मुझे
पाता हूं खुद के करीब खुद को
परत दर परत 
गहरे और गहरे
धंस जाता हूं खुद में
अंधेरा, घुप अंधेरा
रोशनी का निशान नहीं
कितनी छटपटाहट
जैसे गला घोंट रहा हूं अपना ही
आकंठ तक डूबी प्यास
हर तरफ बेचैनी, अशांति
शायद इतना ही भद्दा
रहता है मनुष्य
या फिर अपना ही सच 
जाना है मैंने
पर, हूं खुशकिस्मत
जब भी चूभता हूं 
मैं खुद की नजरों में
तेरी आंखों की पनाह 
ले लेती है आगोश में
वाह, कितना अद्भुत है 
अहसास प्रेम का

Thursday, November 28, 2013

डोर


कहते हैं
वक्त के हाथ होती है
जीवन की डोर
जब धागा टूटा
साथ छूट गया
पर, उसका क्या 
जो है संग तेरे
उसके हिस्से तो है
बस चंद लम्हे
उस वक्त में 
जी लिया तो जी लिया
जी भर खुशियों को
पी लिया तो पी लिया
मैं हूं मोहताज तेरा
तूने जब-जब नजरें फेरी
मानों मेरे जीवन की डोर टूटी
वक्त की क्या मजाल
जो डोर चलाए, जीवन खींचे

काश...


कुछ तो है जो खो रहा है
झड़ रहा है, खिर रहा है
हर पल, हर दिन
बढ़ रहा है तो बस
अनुभव, समझ, उम्र
और मैं
देख रहा हूं खुद में
बहुत कुछ घटते
कुछ-कुछ बढ़ते
बचपन, जो कभी मेरा था
वो दोस्त, जो बुनते थे 
संग ख्वाब मेरे
वो गांव, जो बसा था
दिल में मेरे
खेत, नदी, फसलें, रिश्ते 
सब, सब
काश, लौटा दे कोई
यदि न कर सके इतना तो
जो संग हैं मेरे 
अब न छूटे कभी
नहीं चाहिए तर्जुबा
जिंदगी में मेरी
बस, वो घुले रहे 
यूं ही मुझमें
जो बसे हैं हर पल रूह में मेरी

Thursday, October 31, 2013

'अपना"


दर्द तो वही देता है
जो अपना होता है
वर्ना तो आप हो 
ये भी, किसे पता होता है
आपके होने, ना होने का पता भी
कोई अपना ही तो देता है
वर्ना तो जिंदा हो
इससे भी किसे ताल्लुक होता है
छांह में तो सुस्ताते हैं सब
कड़ी धूप में अपना ही साथ होता है
मुसाफिर तो आते, जाते हैं
कोई अपना ही तो ताउम्र बसर करता है
कोई अपना भले दर्द दे दे
धोखा कभी नहीं देता है
अपनों का दिया दर्द 
अक्सर दवा बन जाता है
वर्ना तो दवा के नाम पर
दुनिया में जहर ही दिया जाता है

Tuesday, October 29, 2013

तू और मैं



भीगा-भीगा
कुछ रूखा-रूखा मैं 
भीड़ में भी 
कुछ तन्हा-तन्हा मैं
हर वक्त, सोते-जागते
व्यस्तता की तलाश में डूबा मैं
काम होकर भी खाली
तन्हाई में भी कहीं खोया मैं
क्या करूं, कैसे पाऊं
तुझसे छुटकर, खुद को मैं
फिर सोचता हूं 
कैसे जी पाऊंगा 
खुद को पाकर 
बिन तेरे मैं
पता है 
ये जो स्पर्श है ना तेरा
हर वक्त मेरे मर्म को
रहता है छुए
चाहूं तो भी 
तुझसे छुटकर कहीं नहीं 
जा सकता हूं मैं

Friday, October 25, 2013

झूठ



वो दिलाता रहा 
यकिने मोहब्बत
और, मुझे उसके झूठ से 
हो गई मोहब्बत
गुजारिश है मेरी
यूं ही तू 
करते रहना इजहार
अब तो कसम से
टिकी है जिंदगी मेरी
तेरे इसी एक झूठ से 

Sunday, September 1, 2013

कुछ इस तरह...


जी ले जरा 
कुछ इस तरह
क्या डर, क्या फिकर
हौंसला है अगर
तो क्या है कठिन डगर
बस तू जी ले जरा
कुछ इस तरह
आंखों में आंखें डाल
बोल तू खुलकर
ना तो ना, हां तो हां
न देख पीछे मुड़कर
बढ़ आगे कुछ इस तरह
मांग हक बांह मरोड़कर
जीत क्या, क्या है हार
बस तू खेल खुलकर 
क्या डर, क्या फिकर
जी ले जरा 
कुछ इस तरह
देख तू नजर भर
खुद में तू इस तरह
तुझ में खुदा, तुझ में है ईश्वर
तो फिर खोना क्या, पाना क्या
इस तरह रो-रोकर जीना क्या
जो हुआ, जो न हुआ
सोच, सोचकर अब डरना क्या
माना न है यकीन तुझमें
न है साहस तुझमें 
पर, मेरे लिए 
बस एक बार
तू कर यह नेक काम 
बस, जी ले जरा 
कुछ इस तरह
जी ले जरा 
कुछ इस तरह...