Wednesday, March 30, 2011

चाहत...

हर रोज जाया हो रहा हूँ मैं
नकली नहीं खालिस सफलता चाहता हूँ मैं
अपने 'होने" को सार्थक करना चाहता हूँ मैं
मकसद से भटक गया हूँ मैं
अपनी नजरों में चढ़ना चाहता हूँ मैं
सबको अपना बनाना चाहता हूँ मैं
भीड़ में भी तन्हा रहना चाहता हूँ मैं
अपनी ही आग में भस्म होना चाहता हूँ मैं
कई बार जीत में भी हार पाता हूँ मैं
रोज जीये जा रहा हूँ मर-मर कर
अब जुनून में जीना चाहता हूँ मैं
घूम रहे हैं कई व्याकुल
उनके लिए कुछ करना चाहता हूँ मैं
खुद में ही और गहरे
और गहरे उतर जाना चाहता हूँ मैं
प्रेम में तरबतर होकर भी
सूखा रहना चाहता हूँ मैं
भूल गया हूँ अपना बचपन
एक बार बच्चा बनाना चाहता हूँ मैं
कहीं बिछड़ गए हैं दोस्त सारे
एक-एक को ढूँढना चाहता हूँ मैं
वजूद के भ्रम में भी देखा जी कर
अब इसे तोड़ना चाहता हूँ मैं
रोज टटोलता हूँ धड़कनों को
मौत को भी छूकर देखना चाहता हूँ मैं






 

Monday, March 28, 2011

मेरे दिल की आवाज हो तुम!

तुम बताओ मैं कैसी हूँ
कई बार पूछती है वो
हर बार बताना चाहता हूँ
तुम एक दिलकश अहसास हो
बारिश की पहली बूँदों में
मिट्टी की नशीली खुशबू हो
रेगिस्तान की आग में
ठंडे पानी का सोता हो
दुनियावी चिंताओं के बीच में
मासूम बच्चे सी किलकारी हो
अमावस की अंध्ोरी रात में
पूनम सी शीतल चाँदनी हो
पथरीली-कंटीली राह में
घास की नर्म पगडंडी हो
झूठों की इस दुनिया में
एक नासमझ सच्चाई हो
भीषण सूखे के लंबे दौर में
पानी से भरी भटकी बदली हो
जिंदगी के दुखों में
खुशियों का इंद्रध्ानुष हो
तमाम चुनौतियों के बीच में
चट्टान का सीना चिर निकली कोपल हो
समुद्र की अथाह गहराई में
सीप से निकला मोती हो
थके मन-मस्तिष्क में
बहती मध्ाुर स्वर लहरी हो
भूखे भेड़ियों के जंगल में
प्यारी सी हिरणी हो
खून जमा देने वाली ठंड में
गुनगुनी अंगीठी हो
अब क्या-क्या बताऊँ तुम्हे
तुम फूलों की खुशबू हो
सुबह की पहली रश्मि हो
तेज उफनता झरना हो
मस्त पवन का झोंका हो
बया का प्यारा घोंसला हो
चूड़ियों की खनक हो
पायल की छम-छम हो
तुम अपना सा स्पर्श हो
अब तुम्हे मैं क्या कहूँ
तुम तो मेरे ही दिल की आवाज हो
तुम वो सारे अहसास हो
जो मै पल-पल जीता हूँ















 

Saturday, March 19, 2011

सहूलियत

कितनी आसानी से कह गई
अब नहीं थामा जाता हाथ
तेज झटका लगा, पूछा-क्यों?
वह निराश थी या फिर गंभीर
पता नहीं, पर वह कुछ बोली जरूर
मैं बड़बड़ाया- तुम डरो नहीं
यूँ बीच भँवर छोड़ना आसान नहीं
पर इस बार वह दृढ़ नजर आई
बोली- मैं तुम्हारी तरह साहसी नहीं
अब साथ मेरे बस की बात नहीं
मैं उसके शुष्क चेहरे को देख समझ गया
मेरी कीमत की एवज में उसने डर को चुना
या फिर इसी में 'सहूलियत" नजर आई
तभी तो जिंदगी का फैसला यूँ कर गई




 

Wednesday, March 16, 2011

ऐसा क्यूँ?



कई  बार शरीर होता है
दिल नहीं होता
कई बार दिल होता है
शरीर नहीं होता
कई बार दिल और शरीर होता है
'वह" नहीं होता
समझ नहीं आता, ऐसा क्यूँ होता
बस मेरे पास ही 'वह" नहीं होता
जो सिर्फ और सिर्फ मेरा होता।



 

Monday, March 14, 2011

सबसे अच्छा दोस्त...

वो कहती-तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो
ऐसे दोस्त जो हरदम मेरे साथ हो
मैं तब महज मुस्कुरा देता
तुम्हारे साथ चाय मजा देती है
तुम न हो तो दुनिया बेमजा होती है
तुम्हारे साथ सफर सुहाना होता है
तुम न हो तो भी तुम्हारा जिक्र होता है
तुम से बहस न हो तो नींद नहीं आती है
तुम बिन पिक्चर की कहानी अध्ाूरी लगती है
तुम्हारे साथ शॉपिंग की बात ही और होती है
मैं यह सब सुनकर भी मुस्करा देता
दिल की बात बताने का हौंसला कहाँ से लाता?
एक दिन हिम्मत करके हिम्मत जुटाई
मेरा हाल-ए-दिल सुन वह महज मुस्कुराई
इसके बाद हमारी बात कभी न हो पाई!







 

मेरे लिए...

तुम मुस्कुराते हुए अच्छे लगते हो
मेरे लिए हर वक्त मुस्कुराया करो
मैं कुछ भी करूँ, कुछ भी कहूँ
मैं बुरा बोलूँ या अच्छा कहूँ
तुमसे हर वक्त तकरार करूँ
तुम मुँह फुलाये अच्छे नहीं लगते हो
मेरे लिए तुम मुझसे यूँ रूठा न करो
मेरी उलझनों को क्यूँ नहीं समझते
उन्हे बढ़ने के लिए क्यूँ छोड़ देते
तुम दूर-दूर अच्छे नहीं लगते हो
मेरे लिए तुम मुझसे ही उलझा करो
कौन नहीं चाहता तुम्हारे संग भटकना
हाथों में हाथ लिए यूँ देर तक घूमना
तुम अकेले-अकेले अच्छे नहीं लगते हो
मेरे लिए तुम मुझे भी संग ले लिया करो
देखो रोज सिमट रही है जिंदगी
तुम्हे पड़ेगी ये दूरी बहुत महंगी
तुम यूँ जाया होते अच्छे नहीं लगते हो
मेरे लिए जिंदगी में मुझे भी शामिल किया करो
मेरे लिए तुम हर वक्त मुस्कुराया करो।












 

अरमानों का कत्लेआम!

खुश थी इक माँ, बेटा आएगा
पति भी काम से जल्द लौटेगा
बेटी-दामाद से घर महकेगा
बहू ने कर ली है सारी तैयारी
रात भर से लगी है बेचारी
नाती-पोतों की भी रहेगी किलकारी
किसे पता था, कौन जानता
किसी देश में यूँ प्रलय आएगा
भावनाओं, तमन्नााओं और
अरमानों का यूँ कत्लेआम हो जाएगा
मैं इतना बड़ा तो नहीं कि
दूँ ईश्वर के निर्णय को चुनौती
पर हे ईश्वर! इतना बता दूँ कि
तेरी माँ भी फूट-फूट रोयी होगी।