तोहमत यह है मेरे सिर
साथ होकर भी कहां साथ होते हो
हर तरफ बिखरी है
महक तेरी
फिर भला कोई चाहकर भी
अकेला कैसे रहे
चाहता हूं
छोड़ दे तू भी अब मुझे
आजमाऊं यह भी तो जरा
कब तलक बसी रहेगी
सांसों में मेरी
तू जिंदगी की तरह
रोज सोचता हूं
बताऊं तूझे
तू दौड़ती है रगों में मेरी
खून की तरह
पर, रोक लेता हूं
तोहमत सुनने के लिए
ये ही तो बताती है
'मैं" भी कहीं रहता हूं
जिंदगी में तेरी
एक हमसाये की तरह
दोस्ती की चाह में
प्रेम कर बैठा
जब उसे पाया तो
फिर पुरानी गलियां याद आईं
ये दिल है, दिल
जो हर बार 'आज" में प्यासा है
मेरा बोलना, चुप रहना
कुछ भी मंजूर नहीं
शायद यह शुरूआत है
एक दिन कह दे वो
तू ही मंजूर नहीं
एक हद तक डरता है दिल
शायद वह मकाम आता है फिर
होने, न होने में
नहीं रह जाता कोई अंतर
खोने का डर, पाने की चाह
क्या बस इतना ही
प्रेम, अधिकार, स्वीकार्य
सबकुछ कितना आश्रित
बंधनों को भी
पता नहीं क्यों
मुक्ति मंजूर नहीं
दुआ करता हूं
जन्म ले हर घर एक बेटी
हर एक को नसीब हो देखना
उसे बढ़ते, सपने बुनते
नसीब हो फूल से
कोमल हाथों की छुअन
पिता के प्रेम में पल-पल
आंखों में भर आते अश्रु भी नसीब हो
उसकी हंसी, मस्ती
नाजुक संवेदनाएं भी हो नसीब
फिर देखना चाहता हूं
कैसे वह कर पाएगा
वह सब, जो अब तक
करता रहा है
पत्नी, मां, बहू
या फिर उससे
जिसे मानता रहा है महज भोग्या
यह भी देखना है मुझे
बेटी नसीब होने के बाद
वह है कौन
जो नहीं बन पाया है
पशु से पुरुष
तूफान, उफान के बाद
जो कुछ बचता है
उसकी जड़ें होती है गहरी
या वजन उसे बचा रखता है
हल्की, उथली, कमजोर
का नहीं रहता कहीं जोर
मैं गवाह हूं
मैं ही हूं वह शख्स
जिसने सहा है
बर्बादी का हर मंजर
फिर भी मैं वहीं हूं
यकीनन रहूंगा भी
ताउम्र ऐसे ही
हां, बस ऐसे ही
तुझसे है वादा
रात... मेरी चेतनावस्था और उसके लिए मेरे आने की आहट। आज रात 3 बजे जैसे ही मैं बिस्तर में घुसा, उसे मैंने किस किया। वो थोड़ी कुनमुनाई... फिर किस का जवाब आया... लव यू दाता। मैंने फिर उसे किस किया तो लगभग मुझे धकेलते हुए बोली- दाता अपनी जगह पर सो जाओ... दाड़ी चुभती है। अचानक वो उठ बैठी और बोली दाता दाढ़ी बना लेना... मैने कहा- ठीक है कटा लूंगा... मुझे मालूम था वो यही बोलेगी... नहीं... कटाना नहीं.. दाढ़ी बना लेना। मैं उसे फिर जकड़ लेता हूं और वो फिर मुझे धकेल देती है।
रोज रात का किस्सा है ये। मैं बिस्तर में घुसता हूं और वो जागती है। मैं किस करता हूं और वो एकदम चैतन्य हो जाती है... फिर शुरू हो जाता है हमारी बातों का सिलसिला।
दाता आय लव यू से शुरू हुआ यह किस्सा दिनभर क्या-क्या किया... नानी के साथ कैसा दिन गुजरा... और सोना से मिलने कौन-कौन आया था... किसने क्या कहा... न जाने क्या-क्या याद रखती है वो। रात में मुझसे बोली- वन... टू... थ्री... सुनाती हूं। मैंने कहा ठीक है... तो जो शुरू हुई तो हिन्दी-अंग्रेजी पोयम... गाने सब टेपरिकॉर्डर की तरह चलने लगे। मैंने कहा- बेबी बहुत रात हो गई है... सो जाते हैं...तो एकदम भड़क गई... बोली- सुनना पड़ेगा।
हम दोनों ठहाका लगाकर बोले- ठीक है। फिर वो शुरू हो गई। कमाल है... ये कमबख्त चांद सा खिला चेहरा और पटर-पटर बातें करती वो... काश कि जिंदगी यहीं थमी रहे... काश कि न नौकरी... न दुनियादारी... का झंझट रहे। काश... कि वक्त यहीं रूक जाए।
...पर शुक्र है वक्त अपनी गति से चल रहा है और एक दिन वो 17 बरस की भी होगी... न जाने क्यों उसे इस उम्र में देखने की ख्वाहिश इसके जन्म से ही है। ...और न जाने कैसे और कब मुझे पता चला कि उसे सुनने और देखते रहने की ख्वाहिश जन्म-जन्मातंर से यूं ही प्यास की तरह मेरे कंठ में आ बसी है।
एक हाथ जब थामता है
दूजे को
क्यूं दोनों की रेखाएं
एक नहीं होती
एक दिल जब सुनाता है
दूजे का हाल
क्यूं दोनों की धड़कन
एक नहीं होती
एक विचार जब बंटता है
दूजे के साथ
क्यूं फिर दोनों की राय
एक नहीं होती
एक कदम जब बढ़ता है
दूजे की ओर
क्यूं फिर राहें
एक नहीं होती
एक रंग चढ़ता है
दूजे पर
क्यूं फिर विश्वास की डोर
एक नहीं होती
एक जिस्म पिघलता है
दूजे में
फिर क्यूं दोनों जान
एक नहीं होती
एक लम्हा मिलता है जब
दूजे के साथ
फिर क्यूं कद्र
एक-सी नहीं होती
कोई तो है बात
फिर भी हममें ऐसी
कि मिलते ही एक-दूजे से
नियति, नियत
न जाने क्यूं, कैसे
हो गई एक