Thursday, March 7, 2013

पशु से पुरुषत्व का सफर



दुआ करता हूं 
जन्म ले हर घर एक बेटी
हर एक को नसीब हो देखना
उसे बढ़ते, सपने बुनते 
नसीब हो फूल से 
कोमल हाथों की छुअन
पिता के प्रेम में पल-पल
आंखों में भर आते अश्रु भी नसीब हो
उसकी हंसी, मस्ती
नाजुक संवेदनाएं भी हो नसीब
फिर देखना चाहता हूं
कैसे वह कर पाएगा
वह सब, जो अब तक 
करता रहा है 
पत्नी, मां, बहू 
या फिर उससे 
जिसे मानता रहा है महज भोग्या 
यह भी देखना है मुझे
बेटी नसीब होने के बाद
वह है कौन
जो नहीं बन पाया है
पशु से पुरुष

Tuesday, February 26, 2013

वादा प्रेम का...



तूफान, उफान के बाद
जो कुछ बचता है
उसकी जड़ें होती है गहरी 
या वजन उसे बचा रखता है
हल्की, उथली, कमजोर
का नहीं रहता कहीं जोर
मैं गवाह हूं
मैं ही हूं वह शख्स 
जिसने सहा है 
बर्बादी का हर मंजर
फिर भी मैं वहीं हूं
यकीनन रहूंगा भी
ताउम्र ऐसे ही 
हां, बस ऐसे ही 
तुझसे है वादा 

Saturday, February 9, 2013

सुनना पड़ेगा...




रात... मेरी चेतनावस्था और उसके लिए मेरे आने की आहट। आज रात 3 बजे जैसे ही मैं बिस्तर में घुसा, उसे मैंने किस किया। वो थोड़ी कुनमुनाई... फिर किस का जवाब आया... लव यू दाता। मैंने फिर उसे किस किया तो लगभग मुझे धकेलते हुए बोली- दाता अपनी जगह पर सो जाओ... दाड़ी चुभती है। अचानक वो उठ बैठी और बोली दाता दाढ़ी बना लेना... मैने कहा- ठीक है कटा लूंगा... मुझे मालूम था वो यही बोलेगी... नहीं... कटाना नहीं.. दाढ़ी बना लेना। मैं उसे फिर जकड़ लेता हूं और वो फिर मुझे धकेल देती है। 
रोज रात का किस्सा है ये। मैं बिस्तर में घुसता हूं और वो जागती है। मैं किस करता हूं और वो एकदम चैतन्य हो जाती है... फिर शुरू हो जाता है हमारी बातों का सिलसिला।
दाता आय लव यू से शुरू हुआ यह किस्सा दिनभर क्या-क्या किया... नानी के साथ कैसा दिन गुजरा... और सोना से मिलने कौन-कौन आया था... किसने क्या कहा... न जाने क्या-क्या याद रखती है वो। रात में मुझसे बोली- वन... टू... थ्री... सुनाती हूं। मैंने कहा ठीक है... तो जो शुरू हुई तो हिन्दी-अंग्रेजी पोयम... गाने सब टेपरिकॉर्डर की तरह चलने लगे। मैंने कहा- बेबी बहुत रात हो गई है... सो जाते हैं...तो एकदम भड़क गई... बोली- सुनना पड़ेगा। 
हम दोनों ठहाका लगाकर बोले- ठीक है। फिर वो शुरू हो गई। कमाल है... ये कमबख्त चांद सा खिला चेहरा और पटर-पटर बातें करती वो... काश कि जिंदगी यहीं थमी रहे... काश कि न नौकरी... न दुनियादारी... का झंझट रहे। काश... कि वक्त यहीं रूक जाए। 
...पर शुक्र है वक्त अपनी गति से चल रहा है और एक दिन वो 17 बरस की भी होगी... न जाने क्यों उसे इस उम्र में देखने की ख्वाहिश इसके जन्म से ही है। ...और न जाने कैसे और कब मुझे पता चला कि उसे सुनने और देखते रहने की ख्वाहिश जन्म-जन्मातंर से यूं ही प्यास की तरह मेरे कंठ में आ बसी है। 

Wednesday, January 2, 2013

यूं हुए हम 'एक"


एक हाथ जब थामता है
दूजे को
क्यूं दोनों की रेखाएं
एक नहीं होती
एक दिल जब सुनाता है
दूजे का हाल
क्यूं दोनों की धड़कन
एक नहीं होती
एक विचार जब बंटता है
दूजे के साथ
क्यूं फिर दोनों की राय
एक नहीं होती
एक कदम जब बढ़ता है
दूजे की ओर
क्यूं फिर राहें
एक नहीं होती
एक रंग चढ़ता है
दूजे पर
क्यूं फिर विश्वास की डोर
एक नहीं होती
एक जिस्म पिघलता है
दूजे में
फिर क्यूं दोनों जान
एक नहीं होती
एक लम्हा मिलता है जब
दूजे के साथ
फिर क्यूं कद्र
एक-सी नहीं होती
कोई तो है बात
फिर भी हममें ऐसी
कि मिलते ही एक-दूजे से
नियति, नियत
न जाने क्यूं, कैसे
हो गई एक
 

Thursday, December 27, 2012

'सम्मान"


कोख में पल रही है वह
मैं डरता हूं
न लाऊं उसे
क्या है यहां ऐसा
मैं दे पाऊंगा जो उसे
आ ही गई है अब
बहुत-बहुत घबराता हूं
बता भी नहीं सकता
बताऊं भी किसे
मेरी ही बेटी है बस वह
और दुनिया के लिए
महज चारा
अखबार भी पढ़ेगी वह
और देखेगी जहान की हकीकत
सवाल भी करेगी वह
और समझेगी भी
नजरों में उतर आई हवस को
डरता हूं मैं
तब कैसे छूपा पाऊंगा
मेरी ही 'नपुंसक" कौम को
उससे और उन तमाम बेटियों से
जिन्हे चाहिए भी तो महज
आधी आबादी का 'सम्मान"
 

Thursday, December 13, 2012

कब...


पनाह में छुपा ले मुझे
कि रास अब आती नहीं ये दुनिया
सदी के मानिंद
गुजरता है हर एक पल
हर शख्स लगता है अजनबी
और चुभती है शूल की तरह जिंदगी
मैं अटका हूं कहीं
कि कब आएगा वो कल
जब काली बदली बन
बरसेगी तू घनघोर
जब शरद की चांदनी बन
कर देगी शीतल मेरा हर पोर
जब सहरा के इस प्यासे को
नख-शिख तक कर देगी तर
कब...कब...कब...
बता ए-पत्थरदिल
जब तू पिघल कर
बहने लगेगी उस दरिया की तरह
जो पनाह देगा मुझे
और मैं डूब जाऊंगा
अनंत-अनंत गहराई में कहीं

Friday, November 16, 2012

काश...


काश, ये निराशा
मेरा सर्वत्र निगल जाए
ना कोई उम्मीद फिर कभी
अपना फन फैलाए
डूब जाऊं अंधेरे में इस तरह
ना फिर कभी 'स्व" नजर भी आए
बस मैं रहूं, मुझमें ही सिमटा
ना कोई फिर दस्तक भी दे पाए
सब कुछ यहीं थम जाए
यहीं, हां बस यहीं रूक जाए
ना कोई साथ चलने की
फिर कभी आशा जगाए
किश्तों की बजाय, काश
मौत अभी ही आ जाए