
गरीबी और भूख के कारण ही तो मेरे माँ-बाप ने बड़े भरोसे से मुझे अपने चाचा-चाची के पास भेजा था। गाँव में कई बार इंदौर का नाम सुना था... आना तो नहीं चाहती थी अपनों को छोड़कर... पर ये भी तो अपने (?) ही कहलाते थे... क्या किया इन्होंने... और इस इंदौर ने भी तो नपुंसकों की तरह देखा भर ना! जबसे इस शहर में आई कोई दिन ऐसा नहीं गुजरा... जब तिल-तिल नहीं मरी... रहम की भीख नहीं माँगी... किसने सुनी मेरी चीखें? सुनी किसी ने? पड़ोसी मेरी सिसकियां सुनकर कमरे और खिड़कियां बंद कर लिया करते थे। दिवारों पर मैंने दर्ज की है अपनी भूख और पीड़ा... पर दीवारें तो दीवारें होती है... कहाँ बोला करती हैं वे... पर इन दीवारों के अंदर और बाहर भी कहाँ बसते हैं इंसान... साले सब के सब जानवर... किसी को कोई मतलब नहीं, कोई मरे या जिये क्या फर्क पड़ता है?
...पर ये दो टांगों का जानवर बहुत हैवान है... बहुत ज्यादा। और साला ये भगवान भी कहाँ होता है? कभी सोचना रोज के अपने स्वार्थों से फुर्सत मिले तो... जिस्म के दर्द से भी कहीं बड़ा दर्द होता है... दिल पर लगे जख्म का... काश कोई मेरे इस दर्द तक कोई पहुँचे... काश किसी को यह पता चले कि रिश्तों का खून... हवस की पीड़ा... भूख... प्यास... हैवानियत... दरिंदगी... और माँ-बाप की हर पल... हर क्षण की याद में बस मौत का इंतजार कैसा होता है... काश की पत्थर बोलते और तुम सब पत्थरों में भी एक दिल होता... काश कि मैं पैदा ही नहीं होती... काश कि ना गरीबी होती... ना भूख... भूख शरीर की भी!
दिन की शुरुआत
होती है तुझीसे
फिर धीरे-धीरे तू
घुल जाती है मुझमें
यूँ, शहद की मानिंद
दिन भर जुबाँ पर
मिठा स्वाद लिए
रहता हूँ मैं भटकता
फिर शाम होते-होते
पता नहीं, कब, कैसे
स्याह बदली बन
छा जाती है मुझ पर
फिर रात भर झड़ी का इंतजार
प्यास है कि कमबख्त
बुझती नहीं

आँख मलते हुए सूरज रात का कंबल फेंक जैसे ही पूरब से झांकने लगा, मेरे गांव का नजारा देख वह चिढ़कर बोला- क्या फिर बुधवार आ गया? उसका मेरे बचपन से लेकर या तबसे जबसे वह मेरे गांव को रोशन करता रहा हो, सवाल होता होगा- ये बुधवार को इस गांव के लोग मेरे जागने से पहले ही क्यों जागकर इतनी हड़बड़ी में रहते हैं? मुझे तो थोड़ा बड़ा होने पर यह समझ आ गया कि मेरे गांव के पास वाले कस्बे जीरापुर में बुधवार को हाट होता है, लेकिन बेचारे सूरज को तो शायद ही अब तक पता चल पाया होगा कि हाट क्या बला है और इसके लिए तमाम गांवों में क्यूं हलचल मचने लगती है?
मैंने जबसे समझ विकसित की, गांवों में हाट के लिए लोगों में एक अद्भुत जुनून पाया है। ऐसा नहीं है कि पास के बड़े कस्बों में जाकर कभी भी खरीदी करने की सहूलियत ग्रामीणों के पास नहीं होती है। हर शहर में स्थायी दुकानें होती है। वस्तुओं के दाम भी लगभग वही... पर मैं सोचता हूं कुछ तो बात होगी हाटों में कि हाट वाले दिन ग्रामीणों का हुजूम उमड़ा चला आता है। वक्त के साथ हाट परंपरा मरी नहीं उल्टे ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित ही हुई है।
आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में सारे लोग हफ्ते भर की खरीदी और तफरिह करने के लिए इसी दिन का इंतजार करते हैं। यहां तक की हाट वाला दिन अनऑफिशियली उस क्षेत्र के अवकाश का दिन होता है। मजदूर वर्ग उम्मीद में होता है कि मालिक या ठेकेदार आज उसे निराश न करें और हाट में खरीदारी के लिए कुछ पैसा दे दे। इधर बस, टेम्पो, ट्रेक्टर आदि वाहन मालिक भी सुबह से ही सवारियां ढोने की पूरी तैयारियों में होते हैं। मंगलवार रात से ही जीरापुर में चहल-पहल शुरू हो जाया करती है। आसपास के सैकड़ों गांवों से मवेशी खरीदी-बिक्री के लिए पहुंच जाते हैं। उधर कपड़े, बर्तन, जूते-चप्पल, खिलौने, चाय, मिठाई, सब्जियों, सौंदर्य प्रसाधन, गोदने वाले अपने-अपने स्थान पर आ जमते हैं। छोटी-छोटी दरियों, चटाइयों और टेंट के नीचे दुनिया-जहान की सामग्री सज जाती है।
सालों से देखता आ रहा हूं पसीने से सने चेहरे और एक-दूसरे को धकियाते लोगों को हाट में खरीदी करते और गपियाते हुए। ...पहले मुझे लगता था-क्या बेवकूफी है। वही सामान, वही किमत फिर ऐसी मारामारी क्यूं? क्या मिलता है इन लोगों को हर हफ्ते यह बेवकूफी करने में? ...पर जब मैं भी घर का सामान खरीदने लायक समझ वाला हुआ, इस बेवकूफी में शरीक हो गया। ...क्योंकि यहां मुझे सामाजिकता, हास्य, सामंजस्य, प्रचार, मनोरंजन जैसे कितने ही रस कुछ घंटों में ही मिल जाते हैं, तो फिर कोई इतने मजे छोड़कर बोरिंग सी खरीदारी क्यों हाट के इतर दिनों में करेगा?
मुझे पता नहीं
कैसा था मैं
जब तू नहीं थी
मुझमें शामिल कहीं
अब भी पता नहीं
कैसा हूँ मैं
क्योंकि अब
तू है शामिल मुझमें
और मैं, नहीं कहीं
शुक्र है नहीं करता तेरा ऐतबार
वर्ना तेरे इंतजार में
एक नहीं हजार बार मरता
गम के चिरागों से
रोशन है जिंदगी मेरी
आखिर कब तक
खुशियों की चाह में
अंधेरे में बसर करता
चलता हूँ रोज अकेला
शाम तक कारवाँ साथ होता
तू ही बता
कब तक तेरी कुरबत की खातिर
बियाबान में भटकता रहता
सोचता हूँ
छोड़ दूँ तुझे अपने हाल पे
पर कमबख्त, तेरा वजूद
रगों में मेरी
लहू बन हरदम दौड़ा करता
ये तेरा असर है कि
दर्द भी अब भाता है मुझे
भटकता हूँ सहरा में मगर
चश्मों की नहीं ख्वाहिश मुझे
मर जाने दो यूँ ही प्यासा
दो बूँद जो पानी दे
अब तो वह फरिश्ता भी
लगे है दुश्मन मुझे
डूबा हूँ यूँ समंदर में तेरे
किनारों की अब कहाँ चाह मुझे
कभी होता था मुट्ठी में जहाँ
अब तो ये दुनिया लगे पराई मुझे
डराता था जो बियाबान कभी
चप्पा-चप्पा लगे है अब वाकिफ मुझे
जख्मों की है बस इतनी-सी रजा
मरहम के लिए ही सही
तू बस छू दे मुझे
देखना एक दिन ऐसा भी होगा
दर्द के सहरा में होगी कश्ती मेरी
और तू दे रही होगी आवाज मुझे
फिर से बात होगी तेरी-मेरी
आँखों में मेरी आँखें डाल
तू कहेगी
फिर कभी छोड़कर न जाना मुझे

वो दोनों हमेशा ही साथ रहे हैं। विश्वास को याद नहीं की कभी वह उसके बिना रहा है। शायद जबसे उसने होश संभाला था, तब से ही वह परछाई की तरह उससे चिपका रहा। सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते हर वक्त। विश्वास ने अकेले में उससे एक बार पूछा भी- क्यों तू मुझे कुछ देर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता। वो हँसा, फिर जवाब देने के बजाय सवाल उछाला- क्या वाकई में तू अकेला होना चाहता है? विश्वास जानता था- वो कभी उसके बिना जी नहीं सकता। बस उसने तो यूँ ही सवाल उछाल दिया था। उसके बाद कभी न तो विश्वास ने इस तरह का कोई सवाल किया, ना ही उसने भी कभी पलटकर पूछा कि क्यों रे, तूने उस दिन ऐसा क्यों पूछा था?
विश्वास ऐसे ही बड़ा होता गया और विश्वास के साथ वो भी लंबा-चौड़ा होता गया। विश्वास जब भी कभी आईने में खुद को देखता, हमेशा खुद को उससे कमतर पाता। तब वो बोला करता- पगले, मैं ही तो तू हूँ और तू ही तो मैं हूँ। फिर वो विश्वास की आँखों में आँखें डालकर बोलता- देखना, एक दिन तू राज करेगा... राज...। करेगा ना। ...और विश्वास कभी भी इंकार कर न पाता।
स्कूल के दोस्तों के साथ जब विश्वास मस्ती कर रहा होता, क्लास चल रही होती, या वह यूँ ही सड़क पर मटरगश्ती कर रहा होता वह साथ बना रहता, कभी नहीं टोकता... अक्सर तो वह भी विश्वास के कंधे पर हाथ रख उसकी मौज-मस्ती में खुद को उड़ेल लेता। विश्वास जब सोने जाता तो वह उसका सिर सहलाता, आँख खुलते ही उसका मुस्कराता चेहरा नजर आता। उससे कई बार पूछा भी कि क्या कभी तू सोता भी है? वह हमेशा ही खिलखिला देता इस बात पर। फिर रहस्यमयी ढंग से विश्वास की ओर देखता और कहता- तुझ पर नजर रखता हूँ मैं। कहीं तू मुझे छोड़कर भाग गया तो? विश्वास कहना तो हर बार चाहता कि तेरे बिना मैं कहाँ जाऊँगा? कौन है जो मुझे इस तरह जानता है? शायद इतना तो मैं भी खुद को नहीं जानता। ...लेकिन यह सब कहने को मौका उसने कभी नहीं दिया।
शायद वो इमोशनल नहीं था या हो सकता है वह भावनात्मक उद्वेलन से बचता रहा हो। उसी का ही कमाल था कि कभी विश्वास का आत्मविश्वास नहीं डोला। स्कूली लाइफ से निकलकर कॉलेज तक के सफर में विश्वास के कई दोस्त बदले। ऐसा नहीं है कि स्कूली दोस्तों से उसका नाता बिल्कुल ही टूट गया। बस मेलजोल कम हो गया। ...पर वह वैसे ही चिपका रहा। सुबह गुड मॉर्निंग विश के बाद देर रात सोने तक वह सतत विश्वास के साथ बना रहता। बड़े मजेदार दिन गुजर रहे थे। उसके साथ के कारण विश्वास को लगता था कि दुनिया मुट्ठी में है। जहाँ भी वह जाता था छा जाता था।
विश्वास का कॉलेज का सफर शानदार रहा। मार्कशीट देखकर उसके पेरेन्ट्स् बहुत खुश थे। उन्हे यकीन था कि बेटे को किसी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छा जॉब जरूर मिल जाएगा। ...लेकिन जब रिजल्ट आया तब विश्वास को उसने कहा था कि मॉम-डेड को बोलना कि वह और पढ़ना चाहता है। उसका लक्ष्य मल्टीनेशनल की घसीटा लाईफ नहीं है। आर्मी है उसका पेशन तो। हालाँकि वह भी यही चाहता था, लेकिन पेरेन्ट्स् को कैसे कहे? खैर, विश्वास ने उसे समझाया कि यार, आखिर हमारी भी घरवालों के लिए कुछ ड्यूटी है। वह कैसे उनके इमोशन्स हर्ट कर सकता है। तब उसने विश्वास को काफी समझाया था कि यार साफ-साफ बोल दे, वैसे भी तू इतना तो कमा ही लेगा कि अच्छे से गुजर हो जाए। ...लेकिन विश्वास पेरेन्ट्स् को कुछ नहीं कह पाया और उसने मल्टीनेशनल में जॉब सर्च करना शुरू कर दी। उसने विश्वास को कभी कुछ नहीं कहा। हाँ, वह सारा दिन पहली बार गुमसुम नजर आया। अगले दिन हालाँकि वह वैसा ही चुस्त-दुरुस्त था। विश्वास ने उससे कहा- सॉरी... वो बोला- यार, सॉरी मत बोल। शायद वह आहत था। कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे। फिर वह धीरे से बोला, पता है कल तूने विरोध खुद से विरोध किया। हालाँकि इसका अधिकार है तुझ, लेकिन इसकी आदत मत बना लेना। विश्वास चुप रहा। वह उठा और विश्वास को गले लगाते हुए कहा- मैं तुझे हारते हुए नहीं देख सकता। तू जीतने के लिए बना है, बस यकीन रख।
विश्वास ने सारी तैयारियाँ की हुई थी। उसने आईने में खुद को देखा। टाई ठीक की, ट्राउजर, शर्ट, शूज सब व्यवस्थित नजर आए। एक बारगी सारे डॉक्यूमेंट भी देख लिए। ऑफिस में दाखिल होते ही सूट-बूट में उसके जैसे ही और लड़के भी नजर आए। हालाँकि विश्वास जानता था कि केवल उसका ही इंटरव्यू नहीं होगा। इतनी बड़ी कंपनी है और पैकेज भी काफी बढ़िया है तो कॉम्पटीशन तो होगा ही।
दो-तीन लड़कों के बाद विश्वास का नाम पुकारा गया। वह एक गहरी साँस लेकर उठने को हुआ तो उसने कंधे पर हाथ रखकर कहा- जो भी पूछे पूरे आत्मविश्वास से जवाब देना। मैं वहाँ रहूँगा तो सही लेकिन देख ही सकता हूँ, चाहकर भी मदद नहीं कर सकता। विश्वास के सामने कंपनी के प्रेसिडेंट एक पैनल के साथ बैठे थे। सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू हुआ। इंटरव्यू शानदार रहा, लेकिन जब रिजल्ट जब डिक्लेयर हुआ तो किसी और का नाम सुनकर विश्वास को जोरदार झटका लगा। यह विश्वास की जिंदगी की जंग में पहली हार थी शायद।
विश्वास रो रहा था और पास में बैठा वो समझा रहा था कि यह महज एक इंटरव्यू था। इसे जिंदगी की लड़ाई से क्यों देख रहा है। चलता रहता है ऐसा। याद रख- तू राज... वह अपना वाक्य भी पूरा नहीं कर पाया था कि विश्वास पागलों का तरह चिल्लाया- बंद कर अपनी बकवास। हर बात तेरी मानता रहा, क्या मिला मुझे? कोई राज करने के लिए नहीं बना हूँ मैं। मुझे एक अच्छी नौकरी चाहिए बस। तू जा किसी और को राज करने के लिए तैयार करना, मुझे नहीं चाहिए ऐसा दोस्त जो मुझे बरगलाता रहे।
वह वहीं बैठा रहा गुमसुम। विश्वास उस दिन पूरी तरह टूट चुका था। पहली बार उसने शराब पी और सारे घरवालों के सोने के बाद वह पहुँचा। सारी रात नशे में विश्वास उसे गालियाँ देता रहा और चिल्लाता रहा चले जा मेरी जिंदगी से। हालाँकि नशे की हालत में भी वह उसी के कांधे पर सवार होकर घर पहुँचा था।
सुबह विश्वास की नींद काफी देर से खुली। उसने कमरे में नजर घुमाई, वह कुर्सी में धँसा मिला, घूरते हुए। विश्वास ने बुझे मन से गुड मॉर्निंग के साथ सॉरी जोड़ दिया। वह कुछ नहीं बोला। सारा दिन घरवालों ने विश्वास से बात नहीं की। बात ही क्या वे तो विश्वास को देखते ही दूसरे कमरे में चले जाते थे। सारा दिन घरवालों को मनाने और गलती नहीं दोहराऊँगा ये बोलने में बिता।
शाम तक सबकुछ नॉर्मल था, सिवाय उसके। विश्वास ने उसे कहा- चल बाहर घूम कर आते हैं। वह बिना कुछ कहे उसके साथ हो गया। दोनों चुपचाप चलते रहे। विश्वास ने इस साइलेंस को तोड़ते हुए कहा- जो हुआ यार उसे भूल जा ना। वह चुपचाप चलता रहा। फिर गहरे बोला- यह दूसरी बार है, जब तू बाहरी कारणों से खुद के ही विरोध में खड़ा हुआ। मैं जानता हूँ तू गलत जा रहा है... पर मैं सिवाय देखने के कुछ नहीं कर सकता... फिर वह हल्के से मुस्कुराया। विश्वास कुछ समझा नहीं... बस उसने इतना भर पूछा- तू नाराज तो नहीं। उसने ना में सिर हिला दिया।
इसके बाद विश्वास ने कई इंटरव्यू दिए। वह हमेशा उसके साथ होता। निराशा में आशा जगाने की कोशिश करता। हाँ, उसने फिर कभी ये नहीं कहा कि याद रख... तू राज करने के लिए बना है। वह बस समझा भर देता और कोशिश करता कि उसका यार कभी निराश न हो। आखिरकार विश्वास को सफलता हाथ लग जाती है। हालाँकि उसकी उम्मीदों के अनुसार पैकेज नहीं था, फिर भी विश्वास खुश था और उससे ज्यादा खुश वह था कि आखिर सफलता मिली तो सही। खुशी के मौके पर उसने आँखों में चमक भरकर कहा कि यह तो शुरूआत भर है। तुम्हे आगे बहुत तरक्की करना है। इस पर विश्वास ने फिर उसे उड़ा दिया, बोला- यार बस भी कर, मुझे मेरी लिमिट मालूम है। वह मुरझा गया।
विश्वास काफी उत्साह से रोज ऑफिस जाता और उसके साथ वह भी। विश्वास ऑफिस में बहुत व्यस्त रहने लगा। दोनों साथ तो रहते, लेकिन सुबह से शाम तक बमुश्किल ही बात हो पाती। हालाँकि वह अब भी विश्वास के साथ साये की तरह ही रहता था, पर विश्वास अब उसकी बात कम ही सुनता था। उसके ही ऑफिस एक लड़की संभावना भी काम करती थी। विश्वास और संभावना में धीरे-धीरे नजदीकी गहराने लगी। बात प्यार और फिर शादी तक जा पहुँची। एक दिन विश्वास ने संभावना से उसका परिचय करवाया। वह नहीं जानता था कि विश्वास के अलावा किसी अन्य से कैसे बात की जाती है। पूरे समय दोनों ही बातें करते रहे, वह चुपचाप बैठा रहा। कुछ भी बोल नहीं पाया। ऐसा नहीं था कि वह उन दोनों के प्रेम से खुश नहीं था। उसका साथी जब कभी खुश हुआ, वह हमेशा ही उसकी खुशी में सिर तक डूबा रहा। दिनों-दिन विश्वास और उसमें वार्तालाप कम होता जा रहा था। वह जानता था कि जो कुछ भी उसके और विश्वास में घट रहा है, वह गलत है। ...लेकिन वह कर भी क्या सकता था।
संभावना और विश्वास की जोड़ी बहुत प्यारी थी। दोनों खुब मजे में थे, लेकिन अब वह बाहर के कमरे में सोने लगा। संभावना को अब भी लगता है कि वह बहुत घमंडी है और वह उसे साथ रखने में कतराती थी। वह विश्वास को कहा करती- तुम्हारे दोस्त में अहं है। वह मुझसे सीधे मुँह बात ही नहीं करना चाहता। विश्वास भी बार-बार यह सुनकर यकिन करने लगा कि उसका दोस्त अहमी है। उसने उसे साथ रखना बंद कर दिया। वह घर के एक कोने में पड़ा रहने लगा। जो खाना बचता वह खाकर गुजारा करने लगा। हाँ, कभी दोस्त को उसने पलटकर कुछ नहीं कहा। वह बीमार रहने लगा, दिन-ब-दिन कमजोर होता गया, लेकिन कभी यह नहीं पता चलने दिया।
दिन गुजरते गए और विश्वास-संभावना के प्रेम का एक पुष्प खिला। जिसका नाम दिया गया 'उम्मीद"। वह घुंघराले बालों वाली काफी खुबसूरत लड़की थी। वह सारा दिन उम्मीद को संभालता। अब रात-दिन लड़की ही उसकी आँखों में बस गई थी। उसे उम्मीद के अलावा कुछ नजर नहीं आता था। धीरे-धीरे वह स्वस्थ होने लगा। उम्मीद भी मम्मी-पापा के बजाय उससे ही आ लिपटती थी। बोलना सीखी तो सारे घर में दौड़-दौड़ कर चिल्लाया करती- देखना एक दिन में राज करूँगी... राज...।
संभावना यह सुन-सुनकर उत्साह से लबरेज हो जाती थी कि उसकी बेटी देखो दुनिया पर राज करने की तमन्नाा लिए बढ़ रही है। ...लेकिन विश्वास जानता था कि यह शब्द उसके दिलो-दिमाग में डाले जा रहे हैं। ...पर जो शब्द खुद के लिए उसे चुभते हुए लग रहे थे, न जाने क्यों वही शब्द इन दिनों उसे लुभा रहे हैं। उसे फिर से अपना वह दोस्त भाने लगा। ...लेकिन वह जब भी उसके पास जाता, वह उसकी ओर देखता तक नहीं था। कई दिनों तक यूँ ही चलता रहा। आखिरकार विश्वास से रहा न गया। मौका देखकर वह अपने दोस्त को लगभग घसीटता-सा बाहर लेकर आया और रुँधे गले से बोला- क्यों कर रहा है तू मेरे साथ ऐसा? वह बोला- क्या कर रहा हूँ और तुम हो कौन? विश्वास चौंका, हतप्रभ होकर बोला- अपने दोस्त के साथ ऐसा तो मत कर। वह बोला- कौन दोस्त? मैं तो तुम्हे नहीं जानता। विश्वास ने उसके पैर पकड़ लिए, लेकिन वह नहीं पसीजा। उसका चेहरा पत्थर हो चुका था। विश्वास के आँसूओं का उस पर कोई असर नहीं था।
वह कठोर आवाज में बोला- जिस दोस्त की तुम बात कर रहे हो, वह कोई नहीं तुम ही थे। वह तुम्हारा -'स्व" था और कोई नहीं था। देखो खुद के अंदर, शायद वहाँ उसकी सड़ी लाश मिल जाए। विश्वास बदहवाश हो चिल्लाया- तुम नहीं जा सकते। मैं इस दुनिया में अकेला मर जाऊँगा। ...लेकिन उसने धकियाते हुए पीठ की और विश्वास के घर में दाखिल हुआ। विश्वास उसके पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया तो देखता है कि उम्मीद निश्चिंत होकर सोई है और वह पास ही बैठ उसे एक टक निहार रहा है। विश्वास कुछ कहता इसके पहले बेटी नींद में बड़बड़ाई- देखना एक दिन में राज करूँगी...। विश्वास दोनों को देख अपने आँसू पोछते हुए कहता है- जरूर करेगी... जरूर... प्लीज... मेरी बेटी का कभी साथ मत छोड़ना... प्लीज...