मेरे पास बैठ
ए-जिंदगी जरा
ले आगोश में मुझे
मेरे उलझे बालों में
ऊंगलियां जरा घुमा
पेशानी पर पड़ी सलवटों को
दे सुकून जरा
बरसों हुए चैन से सोये मुझे
एक मौन की लोरी जरा सुना
मेरी पलकों को चूम कर
मीठा सा एक सपना दे जरा
सहरा के इन प्यासे लबों को
दरिया में डूबो दे जरा
थक कर चूर इस जिस्म पर
अपने निशां छोड़ जरा
आ बैठ मेरे पास ए-जिंदगी
कुछ मेरी सुन
जरा कुछ अपनी सुना
जब भी तन्हाई घेरती है मुझे
पाता हूं खुद के करीब खुद को
परत दर परत
गहरे और गहरे
धंस जाता हूं खुद में
अंधेरा, घुप अंधेरा
रोशनी का निशान नहीं
कितनी छटपटाहट
जैसे गला घोंट रहा हूं अपना ही
आकंठ तक डूबी प्यास
हर तरफ बेचैनी, अशांति
शायद इतना ही भद्दा
रहता है मनुष्य
या फिर अपना ही सच
जाना है मैंने
पर, हूं खुशकिस्मत
जब भी चूभता हूं
मैं खुद की नजरों में
तेरी आंखों की पनाह
ले लेती है आगोश में
वाह, कितना अद्भुत है
अहसास प्रेम का
कहते हैं
वक्त के हाथ होती है
जीवन की डोर
जब धागा टूटा
साथ छूट गया
पर, उसका क्या
जो है संग तेरे
उसके हिस्से तो है
बस चंद लम्हे
उस वक्त में
जी लिया तो जी लिया
जी भर खुशियों को
पी लिया तो पी लिया
मैं हूं मोहताज तेरा
तूने जब-जब नजरें फेरी
मानों मेरे जीवन की डोर टूटी
वक्त की क्या मजाल
जो डोर चलाए, जीवन खींचे
कुछ तो है जो खो रहा है
झड़ रहा है, खिर रहा है
हर पल, हर दिन
बढ़ रहा है तो बस
अनुभव, समझ, उम्र
और मैं
देख रहा हूं खुद में
बहुत कुछ घटते
कुछ-कुछ बढ़ते
बचपन, जो कभी मेरा था
वो दोस्त, जो बुनते थे
संग ख्वाब मेरे
वो गांव, जो बसा था
दिल में मेरे
खेत, नदी, फसलें, रिश्ते
सब, सब
काश, लौटा दे कोई
यदि न कर सके इतना तो
जो संग हैं मेरे
अब न छूटे कभी
नहीं चाहिए तर्जुबा
जिंदगी में मेरी
बस, वो घुले रहे
यूं ही मुझमें
जो बसे हैं हर पल रूह में मेरी
दर्द तो वही देता है
जो अपना होता है
वर्ना तो आप हो
ये भी, किसे पता होता है
आपके होने, ना होने का पता भी
कोई अपना ही तो देता है
वर्ना तो जिंदा हो
इससे भी किसे ताल्लुक होता है
छांह में तो सुस्ताते हैं सब
कड़ी धूप में अपना ही साथ होता है
मुसाफिर तो आते, जाते हैं
कोई अपना ही तो ताउम्र बसर करता है
कोई अपना भले दर्द दे दे
धोखा कभी नहीं देता है
अपनों का दिया दर्द
अक्सर दवा बन जाता है
वर्ना तो दवा के नाम पर
दुनिया में जहर ही दिया जाता है
भीगा-भीगा
कुछ रूखा-रूखा मैं
भीड़ में भी
कुछ तन्हा-तन्हा मैं
हर वक्त, सोते-जागते
व्यस्तता की तलाश में डूबा मैं
काम होकर भी खाली
तन्हाई में भी कहीं खोया मैं
क्या करूं, कैसे पाऊं
तुझसे छुटकर, खुद को मैं
फिर सोचता हूं
कैसे जी पाऊंगा
खुद को पाकर
बिन तेरे मैं
पता है
ये जो स्पर्श है ना तेरा
हर वक्त मेरे मर्म को
रहता है छुए
चाहूं तो भी
तुझसे छुटकर कहीं नहीं
जा सकता हूं मैं
वो दिलाता रहा
यकिने मोहब्बत
और, मुझे उसके झूठ से
हो गई मोहब्बत
गुजारिश है मेरी
यूं ही तू
करते रहना इजहार
अब तो कसम से
टिकी है जिंदगी मेरी
तेरे इसी एक झूठ से