Friday, July 15, 2011
मकड़जाल...
चलना ही है अकेले
तो हाथ क्यों बढ़ाया
माना कि यह भूल थी
तो दामन क्यों ना छुड़ाया
आ ध्ाँसे जब गले-गले
तब ये क्यों समझ में आया
कह रहे हैं अब
सही नहीं जाती
प्यार की ये पेचीदगियाँ
तो ए-मेरी जाँ
इसे मकड़जाल क्यूँ बनाया
पराया...
कोई नहीं बाँट सकता
किसी का दर्द
इस पर यकीं हो चला है
पर क्या करूँ
नहीं देखा जाता मुझसे
अपनों का दर्द
कोशिश करता हूँ तमाम
कुछ बोझ ले सकूँ
सिर अपने
जाता भी हूँ मैं
उनके पास लेकर यही आस
हर बार लौट आता हूँ बैरंग
इस अनुभव के साथ
ये दर्द बाँटने का नहीं
ये मसला तो है
अपनों-परायों का
Thursday, July 14, 2011
महक...
अक्सर देखता हूँ
तुझे मुरझाते हुए
तब सोचता हूँ
तू क्यूँ नहीं बनी प्लास्टिक से
हर वक्त खिली रहती
नकली गुलाब-सी
पर जैसे-ही तेरे
आंचल में सिमटता हूँ
एक महक कर देती
है इस कदर मदहोश
जुट जाता हूँ
तुझे सिंचने में
फिर हौले-से खिल उठती है
तेरी मुरझायी पंखुड़ियाँ
तब भी मैं बैचेन हो
सोचता हूँ- बस ये पल
यहीं, बस यहीं थम जाए
'सोना"
मिल जाए तो मिट्टी
ना मिले तो सोना है
हाँ, यही तो
सब जुबाँ से सुना है
पर मेरी जिंदगी का
तर्जुबा कुछ है जुदा
मुझे जो मिला
वही तो है सोना
बाकी को मैंने
मिट्टी होते भी है देखा
Sunday, July 10, 2011
छुट्टी...
लोगों को छुट्टी चाहिए
खुद के लिए, साथ के लिए
फिर वे गुजारते हैं सारा दिन
भविष्य में, यादों की जुगाली में
कुछ करते जरूरी छूटे काम
या करते सारा दिन आराम
कुछ खपाते किताबों में सिर
या छुट्टियों का कोटा करतेे हैं पूरा
पर मुझे छुट्टी चाहिए सब चोचलों से
ताकि मैं जी सकूँ सारा-सारा दिन
...बस मेरे प्यार के साथ
सफर!
गाड़ी 120 और दिल
हजारों-हजार गुना तेज
उस पर सुबह का ये
गिला, सीलन भरा मौसम
पहाड़ों पर उग आई
बादलों की ये टुकड़ियाँ
आसमाँ से झरते पानी
को हटाते ये वाइपर
उफ्, क्यों मैंने दिल पर
जमा बूँदों पर यूँ हाथ फेर दिया
पूरा सफर यादों से भीगा रहा
मैं रहा वैसा ही रेगिस्तानी सूखा
Friday, July 8, 2011
हार!
जब भी हारा हूँ
हारा हूँ खुद से
कमबख्त परायों में जो
खुद को देख लेता हूँ
कोशिश की है कई बार
'खुद" को बदलने की
हर बार खुद को
पराया पाता हूँ
शिकवा नहीं है मुझे
खुद से और उन दगेबाजों से
मैं तो अब खुद में
और उनमें भी भेद नहीं पाता हूँ
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