तुझे जीने के लिए
जरूरी नहीं है तेरा होना
पर, तेरे होने के लिए अब
मेरा होना है जरूरी
मैं ना रहा तो तू बता
पहचान ही क्या है अब तेरी
कभी जोड़ा करते थे कुछ दिलजले
तेरे नाम के साथ नाम मेरा
पर अब, लेते हैं वे ही सातों पहर
कसमें मेरे प्यार की
तू घड़ी भर ठहर
देख तो सही
कैसे ना होकर भी
किसी में जी रहा होता है कोई
कैसे सहरा में
जीवन की आस में भटकता है कोई
और कैसे डूबकर भी
जीने की तमन्ना रखता है कोई
कैसे छूटकर भी
खुद को जोड़े रखता है कोई
कैसे दर्द के सैलाब में
उम्मीदों के तिनके बीनता है कोई
कैसे तेरे होने, ना होने में
खुद को उम्मीदों में बांधे रखता है कोई
तड़प के लिए जरूरी नहीं
उम्र गुजारी जाए
एक आह ही काफी
मौत के लिए
यकीन ना हो तो
देख आजमां के खुद को
ताउम्र की बातों को
दो बोल से तौल
आजमाना जरूरी है
नहीं तो, उम्र निकल जाती है
गलतफहमियों में कभी
तू डूबना चाहे तो
जरूरी नहीं समंदर ले आगोश में तुझे
एक कतरा ही काफी है
मौत को गले लगाने के लिए
गर तू जीना भी चाहे तो
काफी है खुशियां दो पल की
उन खुशफहमियों से
जो मिलती है तुझे चालाकियों से
मैं पाना चाहता हूं तुझे
दो पल के लिए
वो भारी है तेरे उन पल पर
जो कमाए है तुने जिंदगी भर के लिए
मुझमें तेरे होने की
बस यही है निशानी
दर्द है भीतर कहीं
भरी है बेचैनी
बाहर हर कहीं
हर वक्त है एक खोज
जानता हूं नहीं है तू कहीं
हर चीज है सूनी
जैसे छूट गई है जिंदगी कहीं
सन्नाटे को चीरता सन्नाटा
कहता है, फिर से देख
वो होगी यहीं कहीं
क्या करूं
मुझमें तेरे होने की
बस यही है निशानी
कभी लगता है मैं भी
अतीत हो जाऊं
देखा है मैंने
अधिकांश को इसे गले लगाते
फिर सोचता हूं
क्या होगा उन 'चंद" का
जो चिपकाये हुए है
वर्तमान में सीने से मुझे
और, इनके ही दम पर
मुझे गुमान है
अपने जिंदा होने पर
जब तू लौट आएगी
बातें होंगी जी भर
लौटना जरूर
पर, सोचता हूं छोड़ पाएगी
उस स्व को
जो रात-दिन तुझमें ही
ले रहा होता है सांसें
उस जमीन, घर, दफ्तर को
जो लील जाते हैं तुझे रोज
उस भीड़ को
जिसमें कहीं गुम होते देखा है मैंने
उस ऊहापोह को
जो घटित होती है प्रति क्षण तुझमें
उस मन को
जो हर वक्त है बेचैन
उस विरानी को
जिसे खुशियों के उत्सवों को भी
लीलते हुए देखा है मैंने
उस जिस्म को
जो बस प्यास ही तो जगाता है
जानता हूं इतना सबकुछ छोड़कर
लौटने में वक्त तो लगता है
इसलिए, इस बार लंबा इंतजार
फिर ना जाने के लिए
खालिस तू जब होगी
तभी तो, बातें होंगी जी भर
हर वक्त पकड़ता हूं
वक्त को
इधर, छूटी जाती है
जिंदगी हाथ से
सबकुछ साधने की हवस में
हो रही है खाक
हस्ती मेरी
ऐ-वक्त आखिर
कब देगा चुटकी भर वक्त मुझे
ताकि घड़ी भर देख सकूं
थोड़ा मरहम लगा सकूं
तूने दिए हैं जो घाव मुझे
क्यूं नहीं तू रुक जाता दो पल को
मेरे साथ बातें करता
जिंदगी का तू भी इंतजार करता
फिर बाहों में जकड़ उसे
हमकदम मेरा होता
एक रोज के लिए
लेना चाहता हूं
उधार तुझे, तुझी से
फिर जी भर खर्च करूंगा
इस कदर तुझे, तुझी पर
कि, भूल जाएगी
खुद के जीने का अंदाज
बस याद रहेगी तुझे हमेशा
मुझ पर चढ़ी उधारी
और, खुद से खुद की
ये खरीदारी