ख्वाब कईं बसाए आंखों में
दबाए बेटियां कांख में
वह चलती रही
थकी भी होंगी
हुए होंगे कदम विचलित भी
यकीनन, कईं कोशिशें हुई
रोकने की उसे
पर न वो रुकी
न कभी डगी
बढ़ती रही
हकीकत होते रहे
उन जागती आंखों के ख्वाब
उसी ने बनाया
गुड़िया को खालिस सोना
और, सोना देखते ही देखते
गीतांजली बना नजर आया
ख्वाब तो अब भी पल रहे हैं
उन आंखों में
बस इंतजार है फिर
एक कोपल के 'युगंधर" बनने का
रूह को छू जाए
कुछ ऐसी बात कर
आ घड़ी भर रूक
फिर ना जाने की बात कर
तोड़ दे हर बांध
आ अब बहने की बात कर
बहुत हो गया दूर-दूर
अब पास आने की बात कर
पत्थर की तरह कठोर क्यों
पिघलने की बात कर
तेरे बिन अंधेरी है जिंदगी
बस अब रोशनी की बात कर
आ गये हैं मझधार में
अब डूबने की ही बात कर
हर बार जीत ही जाती है
इस बार कुछ हारने की बात कर
चल दिए हैं सहरा में तो
पानी की नहीं, प्यास की बात कर
बहुत हुई खुशियों की खोज
अब कुछ खो देने की बात कर
तुझ में मैं, मुझमें तू
कुछ ऐसे ही, एक होने की बात कर
क्यों दो दुनी चार, चार दुनी आठ
कभी तो शून्य की बात कर
जिंदा रहने के भ्रम के लिए ही सही
कुछ देर तो मौत की भी बात कर
हर वक्त का चलना ही क्यों
कुछ देर एक-दूजे को देखने की बात कर
मुट्ठी भर जो वक्त है
इसमें पूरी उम्र जीने की बात कर
रूह को छू जाए
कुछ ऐसी बात कर
कुछ ऐसी बात कर...
कभी खुद का जिस्म
भी चुभता है मुझे
कभी चाहता है खुद को
अपने हाल पर छोड़ देना
कभी लाद देना चाहता है
जंजीरें हजारों
तो कभी डूब जाना चाहता है
शून्य में
कभी इस तरह घुल जाना चाहता है सूर्य में
कि हर कतरे से रोशनी फूट पड़े
कभी अंधेरे, घोर अंधेरे में
चाहता है गुम हो जाना
कभी बियाबान में भटक कर
जार-जार चाहता है हो जाना
कभी किसी दरिया में
मर जाना चाहता है प्यासा
कभी किसी सहरा में
देखना चाहता है अपनी मौत
ये दिल जो है ना कमबख्त
हर दर्द चाहता है झेल जाना
पर नहीं चाहता है
कभी नहीं चाहता है
खुद पर एक खरोंच तक आना
जब भी चुनी है कोई राह
चौराहे पर उलझा हूं
जब भी आया है कोई ख्याल
न जाने कैसे चले आते हैं
साथ उसके अनगिनत विचार
जब भी छिडी़ है भावना की एक तरंग
न जाने कहां से उठ आता है ज्वार
हार-जीत के बिच घमासान
आशा-निराशा के बिच का द्वंद
समाज-वैयक्तिक के बिच की खिंचतान
किस कदर खुद को निचोड़ लेता हूं मैं
एक कतरा भी नहीं होता पास मेरे
किसी पेंडूलम की भांति झुलते
हर वक्त खुद को देखना
साधते रहने की ताउम्र की साधना
क्या बस इतनी-सी है जिंदगी?
या नदी, पहाड़, झरने, जंगल
चहचहाहट, मुस्कुराहट
इंसानियत, मुहब्बत
सबको जी भर
एक सांस में भर लेने को ही
कहा जाता है जिंदगी?
पता नहीं
फिलहाल, सिक्के के दो पहलूओं के बिच
Iखड़ीO हुई है मेरी जिंदगी
हाथ में लाल गुलाब
घुटनों के बल
या कुछ यूं करूं
ले आऊं तुझे
एक लांग ड्राइव पर
चटक चांदनी में
कह दूं अपनी बात
या कुछ यूं करूं
नाव में हो सवार
मझधार में हो जाऊं
थोड़ा रूमानी
या फिर
किसी झील के किनारे
नजरों के रास्ते
तुझे करा दू्ं दिल की सैर
या कुछ यूं करूं
तितलियों के देश में
फूलों के बिच
थाम कर तेरा हाथ
दिखा दूं अपने ज़ज्बात
हर वो बात करूं
जो छूती हो दिल को तेरे
और, लाती हो करीब
और करीब तेरे
क्या इतना भर काफी नहीं
हर बार की तरह
फिर एक बार
कह दूं तुझे
हां, प्यार है तुझसे
और, ताउम्र करता रहूंगा
यूं ही प्यार तुझे
एक जान कैसे होते हैं
नहीं पता
ये भी नहीं पता
कब देखा था तुझे जी भर
क्या कभी थामा था
अपने हाथों में तेरा हाथ
सीने से तुझे लगाकर
धड़कने कभी क्या गिनी थी मैंने
दूर तक, बहुत दूर तक
यूं ही मौन कभी घूमते थे हम?
तेरी महक
कभी उठती थी मेरे जिस्म से?
हंसी तेरी
आवाज, वो घंटों बात
कभी की थी हमने?
नहीं पता
ये भी नहीं पता
क्या कभी जीया जाता है ऐसे
शायद सब कुछ, हां सब कुछ
स्वप्न था
ना होता तो
क्या कभी तू नहीं दिला देती याद
जब निराश होता हूं
चाहता हूं थामे हाथ कोई
बातें करें मुझसे मेरी
देखे अंदर झांककर
अंधेरे में चिंगारी सुलगाये
बालों को सुलझाती ऊंगलियां
दिल की गुत्थियां सुलझाये
मौन की भाषा से
ढेरों बातें करता जाए
भीतर उठे लपटें तो
प्यार की बारिश कर जाए
हताशा के काले बादलों में
मेरा साया बन जाए
अकेले में भी
साथ की उम्मीद जगा जाए
लेकिन, जब निराश होता हूं
साथ होती है बस निराशा
मेरी चाहत, कईं-कईं बार
मेरे ही हाथों डूबी है
मेरी ही निराशा में
और मैं
अभिशप्त हूं
ऐसे ही उसे डूबकर
हर बार
मरते देखने के लिए